Yun toh me Shayar Nahi!


यूँ तो मैं शायर नहीं
पर कभी-कभी एक चाहत ऐसी भी होती है,
कि शायरों की शायरी से कुछ लफ्ज़ चुरा कर
तुम्हारी पलकों की चिलमन में रख सकूँ!

कि गुज़रे वक़्त के एहसासों से भरे कुछ लफ्ज़
जिनके मानी अब खो गये है,
उन्हें तेरी बाहों की पनाह दे सकूँ!

कि उन गीतों के कुछ लफ्ज़
जिनके सुर तुम्हारे नूर में उलझे है,
उन्हें तुमसे मिला कर महफ़िल-ए-ग़ज़ल सजा सकूँ!

यूँ तो मैं शायर नहीं
पर कभी-कभी एक चाहत ऐसी भी होती है,
कि तेरे जिस्म से लेकर तेरे एहसासों की
हर वो छोटी से छोटी तफसील,
कुछ लफ्ज़ों की स्याही में रखकर
एक नज़्म में उतार सकूँ!

एक चाहत ऐसी भी होती है,
कुछ लफ्ज़ों की दुनिया में
तुझे हर रोज़ सिर्फ अपना बना सकूँ!

– Sahil

(April, 2017)

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Shaayaron ki Duniya

शायरों की दुनिया में किसी बात का अन्त नहीं होता!

सालों पहले की ख्वाहिशें भी ज़िन्दा रहती है,
एहसास, ज़ख्म और मोहब्बत के किस्से
लफ्ज़ों के जरिये हमेशा कोई नयी नज़्म बुनती है।

वो एक नज़्म – – –

जो काफी होती है
सारे फ़ासले मिटाने को,
सारी दूरियों को नज़दीकियों के पूल पर मिलाने को,
सारे जज़्बातों को फिर से जी जाने को,
कि जैसे कल की ही बात हो!

शायद इसलिए शायरों की गलियों में खामोशियों की बहुत भीड़ रहती है

शायद इसलिए शायरों की दुनिया थोडी अलग, थोड़ी अजीब होती है

और शायद इसलिए शायरों की दुनिया में कोई रिश्ता ख़त्म नहीं होता,

क्योंकि लफ्ज़ों की सोहबत से मिली
शायरों की दुनिया में किसी बात का अन्त नहीं होता!

– Sahil

(May, 2017)

Ekaant

एकांत की एक बात समझ आई आज
ये एकांत, एकांत नहीं!

ये शोर है, जो सुनाई नहीं देता
ये सफ़र है, जो दिखाई नहीं देता,
सारी बेचैनियों को थाम कर अपने अन्दर
ये वो एहसास है, जो कभी आवाज़ नहीं देता!
ये कहानी का वो आधा पन्ना है
जो अधूरा रह जाता है,
ये स्याह लफ्ज़ों के बीच वो श्वेत हिस्सा है
जिसे पढ़ना कोई ज़रूरी नहीं समझता,
ये हवाओं के साथ जुड़ा हुआ वो बादल है
जो चुप-चाप उड़ता जाता है,
ये समन्दर की गहराइयों में डूबा हुआ एक साहिल है
जिसके सब्र की इन्तहा कोई नहीं समझता!

अक्सर देखता हूँ, ये तन्हा है मगर
ये एकांत, शांत नहीं!

एकांत की एक बात समझ आई आज
ये एकांत, एकांत नहीं!

– साहिल

(October 2017)

Khaamoshiyon ke Raaz!

खामोशियाँ कई राज़ लिये बैठी है
किनारों पर शामें इंतज़ार लिये बैठी है,
निगाहों में एक अश्क़ उतर आया है फ़लक से
कोई पढ़ ले इन्हें, ये ख़्वाब लिये बैठी है!

चेहरे ढूंढते है कोई अपने यहाँ
हर चेहरे पर कोई चेहरा डाले बैठी है,
सख़्त हो चले है इन लबों के लहजे
ये टूट जाने के ख़्याल से सहमी बैठी है!

काफ़िले चलने लगे है वक़्त के
सिलसिलों के कुछ सवाल लिये बैठी है,
ज़रूरतों के शहर में सुना है, कुछ आदतें
अब भी कुछ अधूरे से जवाब लिये बैठी है!

कहानी का कोई लम्हा है जैसे
ये सफहों पर एहसासों के अल्फाज़ लिये बैठी है,
लिखती जाती है कोरे कागज़ पर बेरंग सी स्याही
कोई समझ ना ले इन्हें, ये चुप-चाप बैठी है!

खामोशियाँ कई राज़ लिये बैठी है
किनारों पर शामें इंतज़ार लिये बैठी है,
निगाहों में एक अश्क़ उतर आया है फ़लक से
कोई पढ़ ले इन्हें, ये ख़्वाब लिये बैठी है!

खामोशियाँ कई राज़ लिये बैठी है. . .
खामोशियाँ कई राज़ लिये बैठी है!

– साहिल

(October 2017)

Ye Diwali :)

रोशनी के रंगों की सेज सजी है
दिल की चौखट पर खुशियाँ रखी है,
दूरियाँ मिटा कर रिश्तों में
ये दिवाली अपनों को जोड़ रही है!

हर घर आज उजियारा है
हँसी की फुलझड़ियाँ और उमंगों का फंवारा है,
आँखो की चमक में हर लम्हा कैद है
ये दिवाली नई यादें जोड़ रही है!

बचपन की गलियाँ आज फिर से भरी है
शहर से सुना है, कई पुरवाईयाँ लौटी है,
यारों की टोली आज मुद्दत के बाद मिली है
ये दिवाली बचपन से जोड़ रही है!

कुछ आँखो में फिर भी नमी सी है
अपनों के दरमियाँ किसी अपने की कमी सी है,
सारी खुशियाँ अपनी जगह पर लेकिन
ये दिवाली कुछ ग़म भी जोड़ रही है!

महक रही है घर की हवायें
दीवारें भी आज नई सी है,
जल रहे है अँधेरे, दीपक की लौ में
ये दिवाली रिश्तों को जोड़ रही है!

सारी हसरतें खेल रही है
पलकों के झूले पर झूल रही है,
लौट के आया सावन मिलन का
ये दिवाली एहसास जोड़ रही है!

रोशनी के रंगों की सेज सजी है
दिल की चौखट पर खुशियाँ रखी है,
दूरियाँ मिटा कर रिश्तों में
ये दिवाली अपनों को जोड़ रही है!

– साहिल
(१९ अक्टूबर, २०१७ – गुरुवार)

दीपावली के इस पर्व पर आपकी और आपके परिवार की असीम खुशियों की कामना करते हुए आप सभी को मेरी ओर से A very Happy Diwali 🙂

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Bachpan ki Galiyan!

छूट गयी वो गलियाँ बचपन की
अब शिक़वा क्या करना,
रह गयी कई कहानियाँ वहीं
अब गिला क्या करना!

वक़्त ने जैसे चेहरे पर कई चेहरे डाल दिये
कहीं रिश्तों के, कहीं ज़रूरतों के पहरे डाल दिये,
अब वो सुबह नहीं मिलती अंगड़ाई लेती हुई
और रातें अब सुकून में नहीं ढलती,
बहुत शोर है यहाँ रिश्तों के मकान में
इन रास्तों पर अब वो सहूलियत नहीं मिलती!

लबों पर बेफ़िक्री का भी एक ज़माना था
ना कोई परवाह ना कोई बहाना था,
बड़ी खुशहाल सी चल रही थी ज़िन्दगी
जाने क्यों ज़िन्दगी को शहर की ओर बढ़ जाना था!

खैर अब नज़रें चुरा कर जी रहा हूँ
चेहरे पर चेहरे छुपा कर मिल रहा हूँ,
खो गया वो आईना जो अपना सा लगता था
ज़िन्दगी बिखर गई इक सपने में जो कभी पलकों पर सजता था!

छूट गयी वो गलियाँ बचपन की, तो
अब शिक़वा क्या करना,
रह गयी कई कहानियाँ वहीं, तो
अब गिला क्या करना!

– साहिल

(Sep’ 17)

ऐ ज़िन्दगी, तू मुस्कुरा!

कोई वजह मिले ना मिले
ऐ ज़िन्दगी तू मुस्कुरा,
सफ़र में छाँव मिले ना मिले
ऐ ज़िन्दगी तू मुस्कुरा 🙂

दरिया है ये जीवन एक
बहता हुआ फिर भी ठहरा सा,
गहरी सी गहराइयों में डूबा
कुछ अफसानों से रीसा हुआ!
लहरों के उतार चढ़ाव में
कश्ती को किनारों से मिला,
लहरों की गूंज में खामोशियाँ छुपा कर
ऐ ज़िन्दगी तू बहती जा 🙂

ये जो ग़म के किस्से है
सभी के हिस्से है,
नज़रों में तन्हा पलकों पर उतरे
कुछ लम्हों के रिश्ते है!
हावी ना होने दे यादों की गिरहें
ग़म के साये में यूं ना सहम जा,
खुशियों को गले से लगा कर
ऐ ज़िन्दगी तू नये ख़्वाब सजा 🙂

सफ़र में तू अकेला नहीं
ये अकेला तेरा सफ़र है,
हर मोड़ पर मिलना बिछड़ना
जाने-पहचाने अजनबियों का सफ़र है!
जो छूट गया उस पर अफ़सोस नहीं
जो मिल गया उसका जश्न मना,
राहों में तू रुक नहीं
ऐ ज़िन्दगी हर हाल बस चलती जा 🙂

कीमत नहीं मुस्कराहट की कोई
अनमोल एहसास है लबों पर ठहरा,
इन एहसासों के दरमियाँ कहीं
एक खूबसूरत दुनिया बना!
आँखों में भर कर मुस्कुराहटों के नज़ारे
सभी के चेहरे पर ये तोहफ़ा सजा,
रोशन कर हर अंधियारे को
ऐ ज़िन्दगी तू मुस्कुराने की वजह बन जा 🙂

कोई वजह मिले ना मिले
ऐ ज़िन्दगी तू मुस्कुरा,
सफ़र में छाँव मिले ना मिले
ऐ ज़िन्दगी तू मुस्कुरा :))

~ साहिल
(२२ मार्च, २0१७)

Zulfein

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों के साये में बिखरा मिलता है मेरा अक्स
यूँ हाथों से सरका कर तुम उलझाया ना करो,
मैं इस कोशिश में कि एक इशारा मिले अगर हवा का
किसी लट में लिपट कर तुम्हारे लबों पर बैठ जाऊं,
बड़ा प्यारा लगता है तेरी साँसों का इत्र पी लेना
यूँ लबों से लटों को उठाया ना करो!

ज़िन्दगी के साये गुम है कहीं
तुम्हारी बाहों से आज़ाद क्या हुए, फिरते रहते है आवारा,
यूँ फैला कर अपनी बाहों की सरगोशियाँ
फिर से बेचैनियाँ बढ़ाया ना करो!

तेरे चेहरे से जग कर हर सुबह ख़्वाब से मिलता हूँ
इन सुबहों में तुम यूँ प्यार बरसाया ना करो,
आदतें तेरी बड़ी नशीली है, लत्त लगी है मुझे तेरी
यूँ बेहया रातों में तुम शर्म का परदे उठाया ना करो!

ज़िन्दगी मुर्शिदा है तेरी हथेली में उम्र भर
यूँ हाथों की लकीरों से मुझे मिटाया ना करो,
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों के साये में बिखरा मिलता है मेरा अक्स
यूँ हाथों से सरका कर तुम उलझाया ना करो!

~ साहिल

(अगस्त 2017)

Zindagi Abhi Baaki Hai!


जकड़ी हुई हूँ
कुछ रिश्तों के दरमियाँ,
उलझी सी रहती हूँ
खुद से हूँ लापता,
जाने क्या सही है, जाने क्या गलत
ढूंढती हूँ ख्यालों के मेले में, जाने कौनसी हसरत!

ड़र है कि दिल में छुप कर बैठा है
लबों पर कितने ही राज़ दबाये ठहरा है,
ना किसी से कुछ कहा ही जाता है
ना ही खुद को समझाने का जी चाहता है,
बस दिल करता है छोड़ के सब कुछ, तोड़ के सारे बंधन
गिरहों की कैद से आज़ाद हो जाऊ!

ना फ़िक्र हो दुनिया की
ना किसी रिश्ते की ज़रूरत हो,
ये दिल बस साँसें भरता रहे
और ना किसी एहसास की कुर्बत हो,
एक शाम एक किनारे पर सारे कतरें गिरा कर
उन जज़्बातों को कहीं दूर छोड़ आऊ,
खो दिया है खुद को बचपन से निकल कर
ज़रा ढूंढ कर खुद को, खुद से मिल आऊ!

अजनबी सी बेबसी बैठी है दिल में
अजीब सी खामोशी में ढलने लगी हूँ,
जानती हूँ सब कुछ जाने क्यों फिर भी
अन्जान बनने की कोशिश करने लगी हूँ,
ये लम्हें जो बिखरे पड़े है राहों में
इन्हें समेट कर अपने साथ ले जाऊ,
खुद से मिलकर इन लम्हों में
अपने कुछ नये आशियाने सजाऊं!

ना कुछ उलझनें हो, ना कोई शिक़वे
बस खुद को खुद के करीब ले जाऊ,
रिश्तों की सतहों पर अक्सर फिसल जाती हूँ
ज़रा संभल कर जीना सीख जाऊ!

ज़रा सी उलझी, ज़रा जकड़ी हुई, खुद से दूर ज़रूर हूँ मैं
मगर ज़िन्दगी अभी बाकी है, खुशियाँ आगे काफ़ी है, ये भी जानती हूँ मैं।
ज़िन्दगी फिलहाल पहेली है, मगर बहुत ही अच्छी सहेली है
दिल खोल कर ज़िन्दगी से गले मिलना चाहती हूँ मैं,
बस यहीं सोच कर जी लेती हूँ अक्सर,
कि ज़िन्दगी से आशना अभी बाकी है,
ज़िन्दगी मुझमे अभी बाकी है!

– Sahil

(June’ 17)

Ye Raaste!

ये रास्ते थकते नहीं
दौड़ते जाते है दोनों तरफ!

कहीं से आते हुए, कहीं को जाते हुए,
कहीं जुड़ कर मिलते हुए
कहीं टूट कर बिछड़ते हुए,
कहीं आधे-अधूरे, कहीं मिलते है पूरे,
ये रास्ते कहीं रुकते नहीं!

मैं फुटपाथ पर खड़ा सोचता रहता हूँ
आखिर मंज़िल क्या है इन रास्तों की,
ज़िन्दगी में कुछ हौसला मिल जाता
जो मिल जाती फितरत इन रास्तों की!

मगर ये रास्ते थकते नहीं
दौड़ते जाते है दोनों तरफ,
ये रास्ते कहीं रूकते नहीं
चलते जाते है ज़िन्दगी की तरह!

– Sahil

(May’ 17)