Waqt Mila Agar!

वक़्त मिला अगर
तो सोचेंगे तुम्हें कभी,
तब तक के लिये अलविदा!

राहें मिली अगर
तो मिलेंगें फिर कभी,
तब तक के लिये अलविदा!

एक खूबसूरत मोड़ देकर
अब दास्ताँ के सफ़हे पलट दूँगा,
कुछ कह ना सकूँ मगर
बिन कहे सब कह दूँगा,
संभाल कर रखे है सारे खत
और तोहफ़े भी लिपटे पड़े है,
तू चाहे कहीं दिखे ना दिखे
तुझे आईने में हर सुबह देख लूँगा,
अब चल पड़ा हूँ तेरे बिन, तो शायद मैं भी जी लूँगा,
बयाँ शायद कर ना सकूँ, मगर तुझे भूल ना सकूँगा!
शाम को किसी रोज़
अगर सूरज डूबते हुए देख सकूँ,
तो तुझे फिर लिखूँगा,
तब तक के लिये अलविदा!

ज़रूरी सा लगता है अब ज़रूरतें निभाना
ज़िन्दगी के सच को हर रात पीये जाना,
बड़े सितम है इस ज़माने के
आँखो की नमी को होठों में सीये जाना,
कितना अधूरा सा है हर एहसास
अधूरे हिस्सों में अब हर रोज़ बिखरते जाना,
ज़िन्दगी के लम्हें जो ज़िन्दगी बन गये
तस्वीर बन कर अब पलकों पर रूक जाना!
गुज़रो अगर इस गली से कभी,
कोई चेहरा जाना-पहचाना यादों में लाना,
लौट जाना फिर भले ही नज़रें चुरा कर
मगर हाथ मिलाते जाना,
तब तक के लिये अलविदा

वक़्त मिला अगर
तो सोचेंगे तुम्हें कभी,
तब तक के लिये अलविदा!

राहें मिली अगर
तो मिलेंगें फिर कभी,
तब तक के लिये अलविदा!

– साहिल

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Tumhaare Paas!

ज़रा देखो आसपास
मैं हूँ तुम्हारे पास,
हाथों को छू कर निकलता
मैं वो लम्हा हूँ तुम्हारे पास!

एहसासों को अपने तुम्हारी पलकों पर रख कर
खामोशियाँ निगाहों से निगाहों में भर कर,
बहती हुई लहरों में तुम्हारे कदमों से लिपट कर
बरसती हुई बूँदों में तुम्हारे लबों पर नमी रख कर
मैं हूँ तुम्हारे पास!

कई सारे मिसरों से जुड़ कर बनता
तुम्हारी लटों को सहलाती उंगलियों से सरकता,
शायरों की शायरी में तुम्हें रख कर
दूर कहीं मद्धम सी रोशनी में तुमसे मिलता,
तुम्हारे ही ख़्याल का एक टुकड़ा हूँ मैं तुम्हारे पास!

सिलसिले वक़्त के इस कदर जुड़े
अन्जाने कदम इक मोड़ रुके,
ज़िन्दगी के साहिल पर एक ही कश्ती में
एक हो कर दो दिल हर्षाते चले,
दास्ताँ में तुम अकेली नहीं हो
एहसासों के कारवाँ में तुम्हारा हाथ थामे हूँ मैं तुम्हारे पास!

यूँही हर चाहत बयाँ नहीं होती
लफ्ज़ों में तुम्हारी इबादत अब पूरी नहीं होती,
इक आदत है मेरे ज़हन में बसी
बिन तुम्हारे अब खुद से मोहब्बत नहीं होती,
तुम्हारी हर उम्मीद को इन पलकों पर रख कर
तुम्हारे अक्स में कहीं ना कहीं हमेशा हूँ मैं तुम्हारे पास!

छुपा रखी है तुमने मुस्कुराहट
दबा रखी है हर हसरत,
इंतज़ार है तुम्हें उस पल का
मैं जानता हूँ तुम्हारी ये चाहत,
मगर इक पल को ये निगाहें मीच कर
ज़रा देखो आसपास
मैं हूँ तुम्हारे पास,
हाथों को छू कर निकलता
मैं वो लम्हा हूँ तुम्हारे पास,
मैं हूँ तुम्हारे पास!

– साहिल
(18th May, 2018 – Friday)

Putla – The Emotional Puppet!

इन लबों के प्यालों में जो लम्हों की सीलन है
इन्हें साँसों की कैद से आज़ाद कर भी दूँ तो क्या होगा!

इन पलकों की चिलमन में जो सूखे से कतरें है
इन्हें आँखो के समंदर में बहने भी दूँ तो क्या होगा!

एहसासों के रेशे अब भी मौजूद है बिखरी सी गिरहों में
कोई लिबास नये चढ़ा दूँ चेहरे पर भी तो क्या होगा!

एक हवा का झोंका ही काफ़ी है वक़्त के साहिल से गुजरने को
पतझड़ के सूखे पत्तों का वजन सफहों पर रख भी दूँ तो क्या होगा!

मैं एहसास का एक पुतला हूँ
बहुत हल्के, गहरे एहसासों से बना हूँ,
टूट कर बिखरना और फिर नये सिरे से जुड़ना
ये फितरत है मेरी,
मैं इस आदत को अगर बदल भी दूँ तो क्या होगा!

इन लबों के प्यालों में जो लम्हों की सीलन है
इन्हें साँसों की कैद से आज़ाद कर भी दूँ तो क्या होगा!

~ साहिल

(नवम्बर, २०1७)

Mein Shaayar Hoon!

मैं आँखें बंद करके देखता हूँ…
कुछ गुमनाम चेहरे, कुछ बेवजूद इरादे
कुछ अल्फ़ाज़ जो चुराये थे मैने इधर-उधर भटक कर
तो कुछ एहसास जो उतर गये थे ज़हन में!

मैं आँखें बंद करके सुनता हूँ…
कुछ आवाज़ें जिनके सुर कभी बने नहीं,
कुछ सन्नाटे जिन्हें लफ्ज़ कभी मिले नहीं,
कुछ दरारें जो बढ़ती जाती है पल-पल,
मैंतो कुछ आहटें जो रह जाती है ख़ामोशियों के घर!

मैं आँखें बंद करके सोचता हूँ…
कुछ लम्हें जो बीत गये, कुछ अक्स जो रूठ गये,
कुछ शिक़वे जो जुड़ गये, कुछ अपने जो छूट गये,
कुछ ख़्वाहिशें जो कभी मिली नहीं,
कुछ मुलाक़ातें जो कभी हुई नहीं!

मैं शायर हूँ, और शायरों की कलम से देखता हूँ
वो हर एहसास, वो हर अल्फ़ाज़ बड़ी बारीकी से बुनता हूँ,
ज़रूरी नहीं कि हर एक मिसरा मेरी ज़िंदगी से ही जुड़ा हो
मैं कलाकार हूँ, मैं लफ्ज़ों में कला भरता हूँ!

मैं शायर हूँ, मैं आँखें बंद करके
बड़ी शिद्दत से अल्फ़ाज़ों में ज़िन्दगी भरता हूँ!

~ साहिल

(फरवरी २०१८)

Kitaabein!

किताबें बोलती है
कुछ अधूरी कहानियाँ,
कुछ पुराने एहसास,
कुछ गुम लम्हें
कुछ अधूरे अल्फ़ाज़!

किताबें बोलती है
बेबसी के मंज़र,
किनारों की प्यास,
कितने बेरुखे से हो चले
ज़माने के रीत-रिवाज़!

झाँकती है किताबें धूल की परतों से
इन आँखों को फुरसत नहीं मिलती,
दौड़ती चली जाती है इंटरनेट के समंदर में
सुबह से शाम एक झपकी नहीं गुज़रती,
किताबों से जो रिश्ता बनता था हर रोज़
वो रिश्ता अब कहीं खोने लगा है,
पल-पल विकसित होती दुनिया में अब
किताबों से राबता छूटने लगा है,
लफ्ज़ इस उम्मीद में कि अब खुलेगा दरवाज़ा किताब का
और अब मिलेगी राहत इन्हें,
और किताबें इस उम्मीद में कि अब खुलेगा ये बन्द शीशा
और फिर से मिलेगी ज़िन्दगी उन्हें,
मगर इस तसल्ली में हर रोज़ कई लफ्ज़ बिखर जाते है
पन्नों पर रख कर स्याही, ये उलझ कर हमेशा के लिये खो जाते है,
थाम कर वो लफ्ज़, किताबें अब भी
ताकती रहती है उस शीशे से,
चेहरे पर सीलन चढने लगी है
और जिस्म अब सिलवटों से भरा है,
वो महकते हुए पन्ने अब मायूस है
और रंग भी हवाओं का चढ़ने लगा है,
क्या यहीं है इन किताबों की ज़िन्दगी?
बन्द दरवाज़ों के पीछे छुपी?
बड़ी आसानी से दर्द छुपाती है
ये किताबें बोलती है!
कुछ अधूरी कहानियाँ,
कुछ पुराने एहसास,
कुछ गुम लम्हें
कुछ अधूरे अल्फ़ाज़!
ये किताबें बोलती है!

– Sahil
(9th September, 2017 – Saturday)

Shor – The Call!

एक शोर सुनाई देता है
तल्खियाँ कई सारी घेरे रहती है,
उलझनों के साये मिलते है हर तरफ
होठों पर मुस्कुराहट की नमी रहती है!

कुछ बातें है जो अब सताने लगी है
रात की खामोशियाँ कुछ शिकवें सुनाने लगी है,
आहें भर कर वक़्त काट लेती हूँ
ज़िन्दगी अब बड़े होने के तरीके सिखाने लगी है!

अब ड़र नहीं लगता लोगों से मिलने में
अपनों को मिलने से लगता है,
आँखो में जो भर रखे है कई राज़
कोई पढ़ ना ले इन्हें, इस बात का डर लगता है!

गले मिल लेती हूँ, फर्क नहीं पड़ता
ग़म में मुस्कुराना अब मुश्किल नहीं लगता,
बेअदब लगने लगे है ये एहसासों के मुसाफ़िर
दिल का हाल बताना अब ज़रूरी नहीं लगता!

एक गूँज सुनाई देती है चारों ओर
एक चीख़ हर पल चीख़ती रहती है,
एक शोर कहीं से आवज़ें देता रहता है
किसी से बातें करने का अब मन नहीं करता!

ज़िन्दगी कुछ इस कदर उलझ चुकी है
अब खुद से मिलने का वक़्त नहीं मिलता!

– Sahil

(September 2017)

Wajah!

चल लेता हूँ कुछ बेखबर राहों पर
बेवजह कुछ साँसे भरता हूँ,
मिलती नहीं कोई वजह ज़माने में
अब तन्हा सफ़र मैं हर दफ़ा कर लेता हूँ!

लम्हों के मुसाफ़िर पुकारते है मुझे
बड़ी बेसब्री से ढूंढते है,
मैं कोशिश करता हूँ कि मुड़ कर ना देखूँ
अब पलटने की कोई वजह नहीं मिलती!

सारी ख़्वाहिशें, सारे अरमान
कहीं छोड़ आया मैं वो सारे सामान,
ज़रूरतों का एक बैग उठा कर हर रोज़ निकल पड़ता हूँ
अब हसरतें सजाने की वजह नहीं मिलती!

रिश्तों के किनारे डूब गये पिछली बार
एहसासों को पनाह नहीं मिलती,
मैं ज़िन्दगी में गले तक डूब गया था
मगर ज़िन्दगी से मेरी अब नहीं बनती!

लिपट कर सो जाती है तन्हाईयाँ बाहों में
मैं रातों में जाग कर कुछ अंधेरे पढ़ लेता हूँ,
वजह नहीं कोई सफहे पलटने की
फिर भी बेवजह मैं अधूरे फसाने पढ़ लेता हूँ!

चल लेता हूँ कुछ बेखबर राहों पर
बेवजह कुछ साँसे भरता हूँ,
मिलती नहीं कोई वजह ज़माने में
अब तन्हा सफ़र मैं हर दफ़ा कर लेता हूँ!

– साहिल
(12th September, 2017 – Tuesday)

Ye Waqt!

ये वक़्त कहाँ से चला था, ये वक़्त कहाँ को जाता है,
मैने जब से होश सम्भाला, ये वक़्त चलता ही जाता है!

बिन चाबी का कोई खिलौना जैसे
चक्का घूमता ही जाता है,
ना थकता है, ना रुकता है
बेसब्रियों में दौड़ता जाता है;
मैं पूछ लेता हूँ अक्सर वक़्त के काफिलों से
हर कोई चुप-चाप चलता जाता है,
ये वक़्त कहाँ से चला था, ये वक़्त कहाँ को जाता है
मैने जब से होश सम्भाला, ये वक़्त चलता ही जाता है!

बचपन वाले दिन जो बीते
आँखों को भिगोता लाता है,
खो गया वो खूबसूरत पल जो
यादों में हर रोज़ आता है;
गुज़रे कल जो धुंधलाने लगते है
तस्वीरों के बहाने दिखाता है,
बारिशों के मौसम या पतझड़ का सावन हो
ये वक़्त चलता ही जाता है;
एक रोज़ कहीं खो गया था
जाने अब कहाँ ले जाता है,
ये वक़्त कहाँ से चला था, ये वक़्त कहाँ को जाता है,
मैने जब से होश सम्भाला, ये वक़्त चलता ही जाता है!

– Sahil

(30th May, 2017 – Tuesday)

Bachpan Ka Sheher

चार दिन का इतवार है यारों
क्यों ना इस बार मौज मनाये,
उन गलियों में फिर से शोर मचाये
चलो फिर बचपन के शहर जाये!

गले मिले उन शामों से
और सुबह को अंगड़ाइयाँ भर कर फिर सो जाये,
ख़्वाहिशों के आशियाने में लौट जाये
चलो फिर बचपन के शहर जाये!

खेल पुराने दिनों के खेलेंगे
लुका-छुपी में नए कोने देखेंगे,
घर के खाने की खुशबू मन ललचायेगी
सारी बेताबियाँ सुकून से सो जायेगी।
नये इरादे फिर नये सिरे से जोड़ेंगे
ख़्वाबों की पतंग में रिश्तों के धागे जोड़ेंगे,
हसरतें सारी इन पलकों पर फिर लौट आयेगी
धीरे-धीरे बचपन के किस्से खोलेंगे।
नन्हे-से कदम अब भी वही जमे है
ज़रूरतों की राहें इनसे मिलने ना पाये,
कुछ रोज़ ज़िन्दगी से चलो रूबरू हो जाये
चलो फिर बचपन के शहर जाये!

कुछ बन्द पड़े बक्से यादों के खोलेंगे
कुछ छोटे-छोटे किस्से लबों पर डोलेंगे,
फिर से एक बार वही बेफ़िक्री की डालियों पर
बांध कर डोर एहसासों की, मौसम की बाहों में झूलेंगे!
रात की चांदनी में, तारों की महफ़िल में
खोलकर गिरहें हम बेपनाह दौड़ेंगे,
बहुत देर हुई सुकून की चादर ओढ़े
लौट कर एक दफा फिर से ख़ुशियों के लिफ़ाफे खोलेंगे!
पल-पल बदलती दुनिया में यारों
देखो ये बचपन कहीं छूट ना जाये,
वजूद की मिट्टी का तिलक लगाने
चलो फिर बचपन के शहर जाये!

सारी फिक्रें भूल कर दोस्तों
चलो खुद से मिल कर आये,
वक़्त के सफ़र में आराम नहीं होता
चलो फिर बचपन के शहर जाये!

चार दिन का इतवार है यारों
क्यों ना इस बार मौज मनाये,
उन गलियों में फिर से शोर मचाये
चलो फिर बचपन के शहर जाये!

– साहिल
(17th October, 2017 – Tuesday)

Khayaalon Ki Duniya Ka Ek Musafir!

रात की खामोशी के चादर तले
कुछ हलचल हुई थी,
कई ख्याल बिखरे पडे थे
कई लम्हों की आँखे शर्मसार हुई थी,
एक नमी इन पलकों पर भी आ कर ठहरी थी
साँसों ने भी दबी-दबी सी आहें भरी थी!

वो जो लम्हा था
अक्सर मुझसे रातों में मिलता,
खुश रहने की बातें करता
बेफ़िक्रियों के बहाने करता,
और एक मुस्कुराहट को अपने साथ लिये घूमता।

वो अक्सर ले जाता मुझे अपने साथ
उसके घर में सुकून का एहसास होता,
चाहतें लिपट जाती सीने से
और खुशियाँ ज़ायका रख देती मेरे लबों पर,
शायद ही कोई इंसान होगा
जो उसकी तरह ज़िन्दगी से गले लगता।

सुना है,

वो ख़्यालों की दुनिया का एक मुसाफ़िर,
जो ज़िन्दगी के हर पल को बड़े प्यार से संवारता…
गई रात गिर गया था अपने ही सपनों की ऊंचाइयों से
करवट बदलते-बदलते!

मोहबब्त थी उसे ज़िन्दगी से
बड़ी लालसा थी उसे जीने की,
वो ज़िन्दगी को करीब से जानना चाहता था।
वो ज़िन्दगी का प्यारा
ख़्यालों की दुनिया का एक मुसाफ़िर…
गई रात ज़िन्दगी को ही प्यारा हो गया!

रात की खामोशी के चादर तले
कुछ हलचल हुई थी!

कई ख्याल बिखरे पडे थे
कई लम्हों की आँखे शर्मसार हुई थी,

~ साहिल

(मई २०१७)