Sarhadein!

सरहदों के उस पार कौन रहता है?
किसी अपने का एहसास होता है!

ख़्वाबों के परिन्दे अक्सर उड़ आते है
ख़्वाबों पर कहाँ किसी का पहरा रहता है,
अजीब से क़रार है ये लकीरों के दम पर
बाँट रखी है ज़मीन बस कुछ दस्तावेज़ों पर,
उन एहसासों को आखिर कैसे बाँट ले
जो बस चुके है इन दिलों के अन्दर!

बेहतर होता अगर इन एहसासों का भी क़रार होता
कहीं किसी शायरी में इनका भी कोई किनारा होता,
लकीरें ना ही सही मगर कुछ तो तरीका होता
जज़्बातों का किसी तरह कोई तो बंटवारा होता,
बड़ा दर्द होता है जब सरहद के पार कोई अपना रोता है
बेबस दिल बस आहें भरता है!

आखिर सरहदें क्यों है, किसने बनाई?
खुदा ने भी अपनी नाराज़गी जताई।

लकीरों के आस-पास जिस्मों के ढ़ेर मिलते है
और दूर लकीरों से कहीं तड़पते दिल टूटते है,
ना जाने ये दिल क्यों रंजीदा होता है
शायद सरहदों के उस पार भी ऐसा होता है!

आखिर सरहदों के उस पार कौन रहता है?
किसी अपने का एहसास होता है!

~ साहिल

(10 जनवरी, 2017 – बुधवार)

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Awaaz aur Tasveer!

मैं अक्सर आवाज़ को तस्वीर बना कर
रख लेता हूँ पलकों के किनारे,
शाम के आँचल में हल्की-हल्की
नमी सी मिलती है।

मैं अक्सर तस्वीर को आवाज़ बना कर
सुन लेता हूँ लम्हें पुराने,
सन्नाटों के मकान में कोई खलिश
दस्तक देती रहती है।

सोचता रहता हूँ कि आवाज़ें तस्वीर से है, या तस्वीरों से आवाज़ें है!
किनारों पर लहरें है, या लहरों से किनारे है!

ढूंढ रहा हूँ पर मिलता नहीं कहीं,
सुलझा रहा हूँ उलझन को, या उलझते जा रहे सुलझन के दायरे!

मैं आवाज़ को तस्वीर बना कर
रख लेता हूँ पलकों के किनारे,
मैं तस्वीर को आवाज़ बना कर
सुन लेता हूँ लम्हें पुराने!

*Memories*

~ Sahil

(September’ 17)

Bas Ek Kadam Baaki Hai!

वक़्त उस मोड़ पर खड़ा है
जहाँ से एक नया सिलसिला है,
कहानी में एक पन्ना फिर पलटने को
बस एक कदम बाकी है!

भीगी पलकों पर कुछ नई आरज़ू भी है
चेहरे की हँसी में एक नमी भी है,
अलविदा कह कर अब आगे बढ़ जाने को
बस एक कदम बाकी है!

ये रात जब गुज़रेगी
एक दस्तक देकर एहसासों पर,
अजीब सी हलचल होगी
कुछ पुरानी सौगातों पर।
रोशनी जब हल्के से उतरेगी
पलकों की हसरतों पर,
ख़्वाबों की तितलियाँ मचलने लगेगी
ज़िन्दगी के नये लम्हों पर!
ये रात से सुबह में जो बदल जायेगा
कुछ छूट जायेगा, तो कुछ पास आयेगा,
कुछ गिले शिक़वे रख कर पीछे
कुछ यादें रखकर गठरी में,
फिर से एक शुरुआत करने को
बस एक कदम बाकी है!

जश्न मना रहा सारा शहर
एक किनारा थामे बैठा है,
जो पीछे जा रहा है हर पल में
वो लहरें उछाल कर फेंकता है,
लौट आती है लहरें मगर
हर बार बदल सी जाती है,
साहिल के कदमों तले रेत में फ़िसलती
ज़िन्दगी ज़रा सी ढल जाती है,
जो बह गई लहर सी क्या बात थी उसमें
जो आ कर ठहरेगी वो ज़िन्दगी है,
साहिल के बदलते इस मामूल में
बस एक कदम बाकी है!

थाम कर खड़ा है हर कोई
अब बस हर तरफ़ खामोशी है,
घड़ी की रेत भी भरने को है
बस एक कदम बाकी है!

– साहिल

Alvida 2017, Welcome 2018!

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें 🙂 🙂 🙂

Happy New Year 🙂

Khayaal!!!

ख्याल थमने का नाम नहीं लेते
सब कुछ उलझता चला जाता है,
एक के बाद एक, किसी कतार की तरह
ज़िन्दगी में हर सुबह कोई सवाल जुड़ता चला जाता है!

ज़रूरतें कम होती नहीं
उम्मीदों का खर्चा बढ़ता जाता है,
चेहरे पर रखकर हँसी का चेहरा
मुस्कुराये जाने का सिलसिला बढ़ता चला जाता है!

अब दिल नहीं करता किसी से बयाँ करने का
बातें आजकल शिकायतें समझ ली जाती है,
मैं चुप रहना पसंद करता हूँ
खामोशी भी एक तौहीन समझ ली जाती है!

हर तरफ से जकड़े है साये क़ायनात के
खुद का साया भी बिछड़ता जाता है,
रुकता नहीं कोई पल अब यहाँ
वक़्त बेज़ार चलता चला जाता है!

ख्याल थमने का नाम नहीं लेते
सब कुछ उलझता चला जाता है,
एक के बाद एक, किसी कतार की तरह
ज़िन्दगी में हर सुबह कोई सवाल जुड़ता चला जाता है!

~ Sahil

(November’ 17)

Baith Jaana Chahti Hoon!

बैठ जाना चाहती हूँ किनारों पर
लहरों का खेल अच्छा लगता है,
बहुत शोर है अपनों के शहर में
खामोशियाँ सुनना अच्छा लगता है!

अक्सर देखती हूँ कितने अन्जान चेहरें
खुद से मिलना अच्छा लगता है,
रिश्तों के धागे उतार कर कुछ पल
अपने लिये जीना अच्छा लगता है!

शाम के ढलते सूरज की छांव में
रात का साया घुलने लगता है,
मैं रेत की नमी में फिसलने लगती हूँ
मुझे अब अकेले चलना अच्छा लगता है!

माना कि हसरतें अक्सर पूरी नहीं होती
हसरतें फिर भी करने का दिल करता है,
साहिलों से लगकर लहरें हमेशा लौट जाती है
फिर भी साहिलों को इंतज़ार करना अच्छा लगता है!

बैठ जाना चाहती हूँ किनारों प
लहरों का खेल अच्छा लगता है,
बहुत शोर है अपनों के शहर में
खामोशियाँ सुनना अच्छा लगता है!

– साहिल

(अक्टूबर २०१७)

Until We Meet Again!

All the moments, all the memories,
Every step of the beautiful journey,
That you’ve given me…
I’ll take them with me
As you take me with you,
To a place to find something new!

Turning the chapter of life
Staring at the page staring back at me
To write a new story where it’ll be either me or you,
But not us – the one we knew!

I know you’ll pray,
I know you’ll care,
In all those silences I know you’ll shed a smiling tear,
Life isn’t always about being in touch
I know you’ll tell this to you!

Crossing through thoughts
While unfolding a new phase in life,
Let’s bid a bye
Until we meet again!!!

* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *

There’s more to come
There’s more to live
There’s much more stories yet to be,
Our roads may or may not cross again
But all I wish – a better happy world for you!

Let the life take its plot
Let the time take you through what it has got
Sometimes it’s good not to expect the expected
Sometimes it’s good to let yourself liberated,
This life may plan to take you through odds,
All it tests is how long you can be you!

In this journey of life
Our paths crossed each other,
Like a poetry on rhyme
You made every moment a smiling whisper,
Now that it’s time to unfold different routes
I wish you find a better you in you!

Waving at you, I see you walk
I wish I could stop,
Maybe someday, sometime
On the crossroads
Let’s bid a bye
“Until we meet again”!!!

* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *

~~There is no end until the end!~~

– Sahil

(14th December, 2016)

Bas Ab Aur Nahi Hota, Mein Thak Chuki Hoon!

बस, अब और नहीं होता, मैं थक चुकी हूँ,
खुद से, अपनों से, लोगों से…

मैं थक चुकी हूँ!

दिल है कि धड़कता रहता है,
जाने किस धुन में टहलता रहता है,
ना कोई फिक्र इसे, ना परवाह दुनिया की
कुछ एहसासों की गलियों में घुमता रहता है।
थक चुकी हूँ दिल की बेफ़िक्री से, थक चुकी हूँ खुद से लड़ते-लड़ते,
बस, अब और नहीं होता खुद से लड़ना, मैं थक चुकी हूँ दिल की सुनते-सुनते!

शिकायतें लोगों की कम नहीं होती
वक़्त की ज़रूरतें यहाँ ख़त्म नहीं होती,
उलझी हुई हूँ सबको सुलझाने में
खुद की उलझनें है कि ख़त्म नहीं होती।
थक चुकी हूँ उलझनों में उलझ कर, थक चुकी हूँ खुद को मनाते-मनाते,
बस, अब और नहीं होता किसी को मनाना, थक चुकी हूँ रिश्ते निभाते-निभाते!

कोशिश करती हूँ कि सब कुछ संभाल लूँ
वक़्त और हालात में खुद को ढाल लूँ,
मगर कहीं ना कहीं कुछ कमी रह ही जाती है
समझकर, संभाल कर सब कुछ भी, सिर्फ अपनों की नाराज़गी हाथ आती है।
थक चुकी हूँ नाराज़गियों से, खुद को समझना भूल गई हूँ,
बस अब और नहीं होता किसी को समझना, थक चुकी हूँ सब कुछ संभालते-संभालते!

थम जाना चाहती हूँ खुद के साथ
कुछ देर खुद से मिलना चाहती हूँ,
जीना चाहती हूँ खुद के साथ
खुद पर कुछ खुशियाँ लुटाना चाहती हूँ।
थक चुकी हूँ खुद से भागते-भागते, थक चुकी हूँ खुशियाँ लुटाते-लुटाते,
बस अब और नहीं होता खुशियाँ लुटाना, थक चुकी हूँ खुद को छुपाते-छुपाते!

बस, अब और नहीं होता, मैं थक चुकी हूँ,
खुद से, अपनों से, लोगों से…

मैं थक चुकी हूँ!

– Sahil

(June’ 17)

Yun toh me Shayar Nahi!


यूँ तो मैं शायर नहीं
पर कभी-कभी एक चाहत ऐसी भी होती है,
कि शायरों की शायरी से कुछ लफ्ज़ चुरा कर
तुम्हारी पलकों की चिलमन में रख सकूँ!

कि गुज़रे वक़्त के एहसासों से भरे कुछ लफ्ज़
जिनके मानी अब खो गये है,
उन्हें तेरी बाहों की पनाह दे सकूँ!

कि उन गीतों के कुछ लफ्ज़
जिनके सुर तुम्हारे नूर में उलझे है,
उन्हें तुमसे मिला कर महफ़िल-ए-ग़ज़ल सजा सकूँ!

यूँ तो मैं शायर नहीं
पर कभी-कभी एक चाहत ऐसी भी होती है,
कि तेरे जिस्म से लेकर तेरे एहसासों की
हर वो छोटी से छोटी तफसील,
कुछ लफ्ज़ों की स्याही में रखकर
एक नज़्म में उतार सकूँ!

एक चाहत ऐसी भी होती है,
कुछ लफ्ज़ों की दुनिया में
तुझे हर रोज़ सिर्फ अपना बना सकूँ!

– Sahil

(April, 2017)

Shaayaron ki Duniya

शायरों की दुनिया में किसी बात का अन्त नहीं होता!

सालों पहले की ख्वाहिशें भी ज़िन्दा रहती है,
एहसास, ज़ख्म और मोहब्बत के किस्से
लफ्ज़ों के जरिये हमेशा कोई नयी नज़्म बुनती है।

वो एक नज़्म – – –

जो काफी होती है
सारे फ़ासले मिटाने को,
सारी दूरियों को नज़दीकियों के पूल पर मिलाने को,
सारे जज़्बातों को फिर से जी जाने को,
कि जैसे कल की ही बात हो!

शायद इसलिए शायरों की गलियों में खामोशियों की बहुत भीड़ रहती है

शायद इसलिए शायरों की दुनिया थोडी अलग, थोड़ी अजीब होती है

और शायद इसलिए शायरों की दुनिया में कोई रिश्ता ख़त्म नहीं होता,

क्योंकि लफ्ज़ों की सोहबत से मिली
शायरों की दुनिया में किसी बात का अन्त नहीं होता!

– Sahil

(May, 2017)

Ekaant

एकांत की एक बात समझ आई आज
ये एकांत, एकांत नहीं!

ये शोर है, जो सुनाई नहीं देता
ये सफ़र है, जो दिखाई नहीं देता,
सारी बेचैनियों को थाम कर अपने अन्दर
ये वो एहसास है, जो कभी आवाज़ नहीं देता!
ये कहानी का वो आधा पन्ना है
जो अधूरा रह जाता है,
ये स्याह लफ्ज़ों के बीच वो श्वेत हिस्सा है
जिसे पढ़ना कोई ज़रूरी नहीं समझता,
ये हवाओं के साथ जुड़ा हुआ वो बादल है
जो चुप-चाप उड़ता जाता है,
ये समन्दर की गहराइयों में डूबा हुआ एक साहिल है
जिसके सब्र की इन्तहा कोई नहीं समझता!

अक्सर देखता हूँ, ये तन्हा है मगर
ये एकांत, शांत नहीं!

एकांत की एक बात समझ आई आज
ये एकांत, एकांत नहीं!

– साहिल

(October 2017)