Anjaani || अन्जानी

कोई अन्जानी हसरत, एक दास्ताँ अन्जानी सी
लबों पर थामे फिरती
कोई कहानी अन्जानी सी!
निगाहों में नूर के कितने समंदर
पलकों की छलनी से गिरती शिद्दत अन्जानी सी!

ज़ुल्फों के साये में गुम है अब भी
वो बरसों पहले लिखी कोई नज़्म अन्जानी सी!

साँसों की सरक में कोई धुन छुपाती
पहेली कोई दीवानी अन्जानी सी!

चेहरे पर चढे है कितने चेहरे
चेहरों में छुपी एक रूह अन्जानी सी!

जान कर भी ना पहचाना यहाँ कोई
एक अन्जानी कहानी, एक अनदेखी अन्जानी सी!

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एक अन्जानी सी दास्ताँ गुम है
लम्हों की उलझन में मौसम भी नम है,
एक अन्जानी सी दास्ताँ कहीं गुम है!

लफ्ज़ लिखते नहीं बनते
एहसास स्याही में नहीं घुलते,
बड़ी देर हुई इस सफ़र को
मुस्कुराने के इरादे नहीं मिलते,
ठहरी है हर शय कुछ इस क़दर
साये खुद के भी नहीं मिलते,
लिखे थे कुछ रोज़ बैठ कर जो बहाने
उनके अब इशारे नहीं मिलते,
अनजाने से काफ़िले है, अनजाने से हमदम है
एक अन्जानी सी दास्ताँ गुम है!
एक अन्जानी सी दास्ताँ कहीं गुम है!

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तस्वीर में रख कर मुझे
टाँग देना इक रोज़,
आखिर एक दीवार पर ही तो सीमित रह जाती है
ज़िन्दगी के बाद की कहानी!

आँखों मे रख कर पानी बहा देना कभी-कभी
क्योंकि ज़रूरी है ये जताना कि कितनी यादें है पलकों ने छानी!

शीशे पर कभी-कभी वो पुराना कपड़ा भी घुमा देना,
बूढ़ी आँखों पर जमती धुंध हटा देना,
कभी जो बात निकले मेरी भी तो चेहरे पर एक हँसी छुपा लेना,
बंद पड़े बक्सों में से किसी रोज़ वो डायरी सुना देना,
हो सके तो कभी फूलों के सूखे हार में थोड़ा सा स्नेह मिला देना,
वरना रखा ही क्या है उस काँच के पीछे
वही पल-दो-पल में गुज़री साहिल पर रुक कर ज़िन्दगी अन्जानी!

तस्वीर में रख कर मुझे
टाँग देना इक रोज़,
आखिर एक दीवार पर ही तो सीमित रह जाती है
ज़िन्दगी के बाद की कहानी!

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– Sahil

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Kuch Galat Nahi Hai!

कभी-कभी
खुद से बतियाना
गलत नहीं है,
खामोशी के किनारे
लम्हों से मिल आना
गलत नहीं है!

इक हवा के झोंके का
इन आँखों से टकराना,
पलकों की छलनी में
कुछ इशारें भर जाना,
सब कुछ भूल कर अक्सर
उस रास्ते बढ़ जाना,
जहाँ से लौटने की शायद
फिर वजह नहीं है!
बेफिक्री से खुद को
आगे कर जाना,
अन्जान सिलसिलों में
कुछ पल बीताना,
हसरतों से मिलने को
चाहे उड़ कर गिर जाना भी
कुछ गलत नहीं है!

थम जाना कुछ देर
मुसीबतों के साये में,
या वक़्त के काफ़िले संग
बढ़ जाना उस चौराहे पे,
कहानी जिस सफ़र की
पूरी नहीं है,
गिला किस बात का यारों
कोई ख़्वाहिश अगर अधूरी रही है,
क्या फर्क पड़ता है, हो सकता है शायद
ज़िन्दगी की हथेली में लकीरें
पूरी नहीं है!
ये मान लेना कि दुनिया यूँही चलती है
मजबूरी सही, कुछ गलत नहीं है,
ज़माने की दुश्वारियाँ है शायद
जो कुछ आँखों की चमक अब पूरी नहीं है!
सुन लेता हूँ अक्सर
जो सब कहते है,
सुन लेने में सुना है
कोई क्षति नहीं है,
मगर जब दिल करता है
तब तोड़ कर सारे बंधन,
भर लेना अल्फाज़ों में खुद को
कुछ गलत नहीं है!

अश्क़ बेज़ार ही बह जाये तो क्या
तसल्ली अगर गैरों से मिल जाये तो क्या,
हर चाहत मुकम्मल हो जाये
हर बार ये ज़रूरी नहीं है,
मगर उम्मीद से अगर कुछ खुशी मिल जाये तो
शायद कुछ गलत नहीं है!

अंधेरों के दरमियाँ कुछ अटका है कहीं
सवेरों के उफूक अब जानते नहीं,
दिन से रात में कुछ बदल सा जाता है
कैसे अब साहिल लहरों में पिघल सा जाता है,
मगर भटके इशारों में कभी ज़िन्दगी मिल भी जाये तो
शायद कुछ गलत नहीं!

कभी-कभी
खुद से बतियाना,
खामोशी के किनारे
लम्हों से मिल आना
गलत नहीं है!

– साहिल
(२ मई, २०१८ – बुधवार)

Tu Rehja Mujhme

तू रह जा मुझमें
बस इतना काफ़ी है,
सारी उम्र गुज़ारने को
तेरा चेहरा काफ़ी है!

चिट्ठियाँ लिखकर तेरा हाल पूछुंगी
जवाब ना मिले मगर हर बार पूछुंगी,
तू कलम से उतरेगा सफहों पर हर बार
हर बार मैं तेरा ख़्याल भेजूँगी,
सोहबतों की हदों को तोड़ कर हर दफ़ा
मैं सीधा तेरे लबों पर बैठूँगी!
पास तू रहे ना रहे
तू भूल ना जाना बस इतना काफ़ी है,
तू रह जा मुझमें
बस इतना काफ़ी है!

इंतज़ार में हर शाम ठहरूँगी
सपनों का आशियाना तेरे साथ जोडूंगी,
तू पानी में बह जाये चाहे जितनी मरतबा
मैं फिर भी रेत में हमारा नाम जोडूंगी,
तेरी बाहों के घेरे महसूस कर खुद को
हवाओं के आंचल हर रात ओढूंगी!
हाथों में हाथ रहे ना रहे
माथे पर तू मौजूद रहे बस इतना काफ़ी है!

तू रह जा मुझमें
बस इतना काफ़ी है,
सारी उम्र गुज़ारने को
तेरा चेहरा काफ़ी है!

~ Sahil

(March 2018)

A Trip to Childhood!

बचपन के शहर की यादों को अक्सर यहाँ कुछ नन्हे से चेहरों पर देख लेता हूँ
थोड़ा सा सुकून मिलता है,
एक एहसास लौट आता है जो पल भर में लबों पर एक प्यारी सी मुस्कान रख देता है,
सारी फिक्रें कुछ देर के लिये मानो इस लुका-छुपी के खेल में कहीं लुप्त हो जाती है,
निगाहों के सामने बचपन वाली वो बेफ़िक्री उतर आती है,
वो शोर, वो किलकारियाँ, वो हर गली के नुक्कड़ पर मिलती यारियाँ
मुझे उन सुनहरे लम्हों की दास्ताँ सुनाती है!

मेरा भी एक बचपन हुआ करता था
मैं भी इन नाज़ुक सी कलियों की तरह ज़िन्दगी से गुफ्तगू किया करता था,
मैं भी सो जाया करता था बिना इस ख़्याल के कि कल क्या होगा
मैं भी यूँ शाम में दोस्तों संग चल पड़ता था बस ये सोच कर कि आज कौन जीतेगा,
कोई होड़ नहीं थी, ना ही कोई स्पर्धा होती थी
बस एक हसरत थी जो अक्सर अपनों के बीच जुनून का शक्ल ले लेती थी,
मिट्टी के टीले बनाने से लेकर गले में टाई बांधने की मशक्क़त भी
मानो किसी शूरवीर का एहसास दिलाती थी,
बस इसी कश्मकश में घड़ी बीत जाती थी
कि आखिर ख़्वाबों की दुनिया कहाँ होती है, कैसी होती है!

अब बचपन से दूर बड़ा हो कर देखता हूँ तो सब कुछ एक कपट सा लगता है,
हर पल एक डर सा लगता है, हर रोज़ कुछ अलग सा लगता है,
एक बेचैनी सी रहती है आसपास और ख़्यालों के मेले में ये दिल भटकता रहता है,
सब कुछ होते हुए भी कुछ कम सा लगता है
ज़रूरतों का मारा हर कोई यहाँ अधूरा सा लगता है,
बचपन वाली शामें अब नहीं मिलती, आफताब में आँखें अब नहीं खुलती
कोशिश करता हूँ कि लौट जाऊ फिर वही
मगर इस अन्जान चेहरे पर अब बचपन वाली मासूमियत नहीं मिलती!

खो जाता हूँ खुद में अक्सर
जब मोहल्ले में कुछ बीते हुए लम्हें ढूँढता हूँ,
ख़ामोशियों के किनारों पर
बचपन में छूटी कागज़ की कश्तियाँ ढूँढता हूँ,
हर कोई गुम है यहाँ
जाने कहाँ, किस वजह से घूमता हूँ,
ज़िन्दगी तू एक बार फिर से मिला दे
मैं खुद ही खुद में अब खुद को ढूँढता हूँ,
बचपन के किस्से एक दफ़ा फिर से सुना दे
मैं इन नन्हे से इशारों में बचपन के किस्से ढूँढता हूँ!

~ Sahil

(23rd June, 2018 – Saturday)

Badalna Zaruri Hai!

पल-पल बदलती इस दुनिया में
खुद को बदलना भी ज़रूरी है!
दिन का शाम में ढल कर
रात का उतरना भी ज़रूरी है,
पतझड़ के मौसम में शाखों को उजड़ कर
एक नयी ज़िन्दगी मिलना भी ज़रूरी है,
पल-पल बदलती इस दुनिया में
खुद को बदलना भी ज़रूरी है!

रिश्तों के हिस्से आजकल ज़रूरतों के किस्से है,
कोई आरज़ू के पिघले हुए कतरों से बहकर
लबों पर एक दिखावट का घुलना ज़रूरी है!

आदतें जो एक रहगुज़र बन चुकी थी,
अब राहों के बदलने पर
और हमसफर के छूटने पर
उस मामूल से रिश्ता टूटना भी ज़रूरी है!

एहसासों की बंदिशों में कैद है आज भी निगाहें
जिस पर अब कोई हक़ नहीं,
उन सलाखों की ज़ब्त से निकलकर
एहसासों का बदलना ज़रूरी है!

वजूद के सांचे बड़ी मुश्किल से मिलते है,
बदलते रिश्तों के नये वजूदों में
बदलती ज़िन्दगी को गले लगा कर
एक नये सीरे से शुरुआत करना भी ज़रूरी है!

वक़्त का चक्का घुमता रहता है
लम्हों को नये लम्हें देता है,
उन लम्हों में बढ़ती उधारी का एक दिन
हिसाब चुकाना भी ज़रूरी है!

ज़िन्दगी बस एक दफ़ा है
जी लो जिस पल जो जहाँ है,
किसी और की खातिर ना सही
खुद की खातिर बदलना भी ज़रूरी है!

बेहतर होगा वक़्त की नज़ाकत और ज़िन्दगी की मोहब्बत को समझो,
मत करो वक़्त को इतना बेबस
कि और कोइ तरीक़ा ना रहे,
बदलाव ही एक स्थिरता का प्रमाण है
क्योंकि बदलना बहुत ज़रूरी है!

पल-पल बदलती इस दुनिया में
खुद को बदलना भी ज़रूरी है!

– Sahil
(18th April, 2017 – Tuesday)

Waqt Mila Agar!

वक़्त मिला अगर
तो सोचेंगे तुम्हें कभी,
तब तक के लिये अलविदा!

राहें मिली अगर
तो मिलेंगें फिर कभी,
तब तक के लिये अलविदा!

एक खूबसूरत मोड़ देकर
अब दास्ताँ के सफ़हे पलट दूँगा,
कुछ कह ना सकूँ मगर
बिन कहे सब कह दूँगा,
संभाल कर रखे है सारे खत
और तोहफ़े भी लिपटे पड़े है,
तू चाहे कहीं दिखे ना दिखे
तुझे आईने में हर सुबह देख लूँगा,
अब चल पड़ा हूँ तेरे बिन, तो शायद मैं भी जी लूँगा,
बयाँ शायद कर ना सकूँ, मगर तुझे भूल ना सकूँगा!
शाम को किसी रोज़
अगर सूरज डूबते हुए देख सकूँ,
तो तुझे फिर लिखूँगा,
तब तक के लिये अलविदा!

ज़रूरी सा लगता है अब ज़रूरतें निभाना
ज़िन्दगी के सच को हर रात पीये जाना,
बड़े सितम है इस ज़माने के
आँखो की नमी को होठों में सीये जाना,
कितना अधूरा सा है हर एहसास
अधूरे हिस्सों में अब हर रोज़ बिखरते जाना,
ज़िन्दगी के लम्हें जो ज़िन्दगी बन गये
तस्वीर बन कर अब पलकों पर रूक जाना!
गुज़रो अगर इस गली से कभी,
कोई चेहरा जाना-पहचाना यादों में लाना,
लौट जाना फिर भले ही नज़रें चुरा कर
मगर हाथ मिलाते जाना,
तब तक के लिये अलविदा

वक़्त मिला अगर
तो सोचेंगे तुम्हें कभी,
तब तक के लिये अलविदा!

राहें मिली अगर
तो मिलेंगें फिर कभी,
तब तक के लिये अलविदा!

– साहिल

Tumhaare Paas!

ज़रा देखो आसपास
मैं हूँ तुम्हारे पास,
हाथों को छू कर निकलता
मैं वो लम्हा हूँ तुम्हारे पास!

एहसासों को अपने तुम्हारी पलकों पर रख कर
खामोशियाँ निगाहों से निगाहों में भर कर,
बहती हुई लहरों में तुम्हारे कदमों से लिपट कर
बरसती हुई बूँदों में तुम्हारे लबों पर नमी रख कर
मैं हूँ तुम्हारे पास!

कई सारे मिसरों से जुड़ कर बनता
तुम्हारी लटों को सहलाती उंगलियों से सरकता,
शायरों की शायरी में तुम्हें रख कर
दूर कहीं मद्धम सी रोशनी में तुमसे मिलता,
तुम्हारे ही ख़्याल का एक टुकड़ा हूँ मैं तुम्हारे पास!

सिलसिले वक़्त के इस कदर जुड़े
अन्जाने कदम इक मोड़ रुके,
ज़िन्दगी के साहिल पर एक ही कश्ती में
एक हो कर दो दिल हर्षाते चले,
दास्ताँ में तुम अकेली नहीं हो
एहसासों के कारवाँ में तुम्हारा हाथ थामे हूँ मैं तुम्हारे पास!

यूँही हर चाहत बयाँ नहीं होती
लफ्ज़ों में तुम्हारी इबादत अब पूरी नहीं होती,
इक आदत है मेरे ज़हन में बसी
बिन तुम्हारे अब खुद से मोहब्बत नहीं होती,
तुम्हारी हर उम्मीद को इन पलकों पर रख कर
तुम्हारे अक्स में कहीं ना कहीं हमेशा हूँ मैं तुम्हारे पास!

छुपा रखी है तुमने मुस्कुराहट
दबा रखी है हर हसरत,
इंतज़ार है तुम्हें उस पल का
मैं जानता हूँ तुम्हारी ये चाहत,
मगर इक पल को ये निगाहें मीच कर
ज़रा देखो आसपास
मैं हूँ तुम्हारे पास,
हाथों को छू कर निकलता
मैं वो लम्हा हूँ तुम्हारे पास,
मैं हूँ तुम्हारे पास!

– साहिल
(18th May, 2018 – Friday)

Putla – The Emotional Puppet!

इन लबों के प्यालों में जो लम्हों की सीलन है
इन्हें साँसों की कैद से आज़ाद कर भी दूँ तो क्या होगा!

इन पलकों की चिलमन में जो सूखे से कतरें है
इन्हें आँखो के समंदर में बहने भी दूँ तो क्या होगा!

एहसासों के रेशे अब भी मौजूद है बिखरी सी गिरहों में
कोई लिबास नये चढ़ा दूँ चेहरे पर भी तो क्या होगा!

एक हवा का झोंका ही काफ़ी है वक़्त के साहिल से गुजरने को
पतझड़ के सूखे पत्तों का वजन सफहों पर रख भी दूँ तो क्या होगा!

मैं एहसास का एक पुतला हूँ
बहुत हल्के, गहरे एहसासों से बना हूँ,
टूट कर बिखरना और फिर नये सिरे से जुड़ना
ये फितरत है मेरी,
मैं इस आदत को अगर बदल भी दूँ तो क्या होगा!

इन लबों के प्यालों में जो लम्हों की सीलन है
इन्हें साँसों की कैद से आज़ाद कर भी दूँ तो क्या होगा!

~ साहिल

(नवम्बर, २०1७)

Mein Shaayar Hoon!

मैं आँखें बंद करके देखता हूँ…
कुछ गुमनाम चेहरे, कुछ बेवजूद इरादे
कुछ अल्फ़ाज़ जो चुराये थे मैने इधर-उधर भटक कर
तो कुछ एहसास जो उतर गये थे ज़हन में!

मैं आँखें बंद करके सुनता हूँ…
कुछ आवाज़ें जिनके सुर कभी बने नहीं,
कुछ सन्नाटे जिन्हें लफ्ज़ कभी मिले नहीं,
कुछ दरारें जो बढ़ती जाती है पल-पल,
मैंतो कुछ आहटें जो रह जाती है ख़ामोशियों के घर!

मैं आँखें बंद करके सोचता हूँ…
कुछ लम्हें जो बीत गये, कुछ अक्स जो रूठ गये,
कुछ शिक़वे जो जुड़ गये, कुछ अपने जो छूट गये,
कुछ ख़्वाहिशें जो कभी मिली नहीं,
कुछ मुलाक़ातें जो कभी हुई नहीं!

मैं शायर हूँ, और शायरों की कलम से देखता हूँ
वो हर एहसास, वो हर अल्फ़ाज़ बड़ी बारीकी से बुनता हूँ,
ज़रूरी नहीं कि हर एक मिसरा मेरी ज़िंदगी से ही जुड़ा हो
मैं कलाकार हूँ, मैं लफ्ज़ों में कला भरता हूँ!

मैं शायर हूँ, मैं आँखें बंद करके
बड़ी शिद्दत से अल्फ़ाज़ों में ज़िन्दगी भरता हूँ!

~ साहिल

(फरवरी २०१८)

Kitaabein!

किताबें बोलती है
कुछ अधूरी कहानियाँ,
कुछ पुराने एहसास,
कुछ गुम लम्हें
कुछ अधूरे अल्फ़ाज़!

किताबें बोलती है
बेबसी के मंज़र,
किनारों की प्यास,
कितने बेरुखे से हो चले
ज़माने के रीत-रिवाज़!

झाँकती है किताबें धूल की परतों से
इन आँखों को फुरसत नहीं मिलती,
दौड़ती चली जाती है इंटरनेट के समंदर में
सुबह से शाम एक झपकी नहीं गुज़रती,
किताबों से जो रिश्ता बनता था हर रोज़
वो रिश्ता अब कहीं खोने लगा है,
पल-पल विकसित होती दुनिया में अब
किताबों से राबता छूटने लगा है,
लफ्ज़ इस उम्मीद में कि अब खुलेगा दरवाज़ा किताब का
और अब मिलेगी राहत इन्हें,
और किताबें इस उम्मीद में कि अब खुलेगा ये बन्द शीशा
और फिर से मिलेगी ज़िन्दगी उन्हें,
मगर इस तसल्ली में हर रोज़ कई लफ्ज़ बिखर जाते है
पन्नों पर रख कर स्याही, ये उलझ कर हमेशा के लिये खो जाते है,
थाम कर वो लफ्ज़, किताबें अब भी
ताकती रहती है उस शीशे से,
चेहरे पर सीलन चढने लगी है
और जिस्म अब सिलवटों से भरा है,
वो महकते हुए पन्ने अब मायूस है
और रंग भी हवाओं का चढ़ने लगा है,
क्या यहीं है इन किताबों की ज़िन्दगी?
बन्द दरवाज़ों के पीछे छुपी?
बड़ी आसानी से दर्द छुपाती है
ये किताबें बोलती है!
कुछ अधूरी कहानियाँ,
कुछ पुराने एहसास,
कुछ गुम लम्हें
कुछ अधूरे अल्फ़ाज़!
ये किताबें बोलती है!

– Sahil
(9th September, 2017 – Saturday)