Fir Wohi Baat

ये ज़िन्दगी भी अब
मौसम के जैसी लगती है!

ऑफिस की खिड़की से 
कब सुबह शाम में तब्दील हो जाती है,
और कब धूप तन्हा मायूस ही ढल जाती है
पता ही नहीं चलता!

शाम की ठंडी हवायें,
और आसमान से गिरती हल्की-हल्की बूँदें
इस बदन को सुस्ताने लगती है!

रात में ये आकाश बिलखने लगता है
ज़ोर ज़ोर से शोर कर चमकता है,
गुज़रे पलों की यादों में
ये आँखें और हसरतें,
रोते-रोते कब ख़्वाबों में गुम हो जाती है
पता ही नहीं चलता!

अचानक आँख खुलती है 
तो सुबह होती है,
फिर क्या…
मौसम की तरह ज़िन्दगी में भी
फिर वही बात होती है!!!

– Sahil
(26th September, 2016)

Ek Dost Tere Jaisa

Ek dost tere jaisa sabka hona chahiye!
Jo khali pade iss banzar dil ko jeena sikhaaye,
Jo chehre par muskuraahat ke khubsoorat rang sajae,
Jo suni padi in aankhon me jhaank kar inka haal bataye,
Ek dost tere jaisa sabka hona chahiye!!!

Ghanto gappe ladaye jis se, aur fir use hi kamina bulaye,
Jo meri har cheez par haq se apna adhikaar jataye,
Jo pani me fenk kar muje, bachaane ko khud bhi kud jaaye,
Ek dost tere jaisa sabka hona chahiye!!!

Jo dur hokar bhi paas hone ka ehsaas dilaaye,
Jise mere har kadam ka mujse pehle andaaza hojaye,
Jiske saath hum zindagi ka koi bhi raaz kehne se na katraaye,
Ek dost tere jaisa sabka hona chahiye!!!

Jo hamari galtiyon par hume sahi raah dikhaye,
Khuda bhi agar chaahe toh use humse cheen na paaye,
Zindagi me jo zindagi hone ka zariya ban jaye,
Sach me, ek dost tere jaisa sabka hona chahiye!!!


~ Sahil
(6th July, 2016)

Aankhon ke Ishaarein!

अनकही सी कितनी बातें कह जाते है,
महफिलों में प्यार के लफ्ज़ बन जाते है,
बेबसी इन लबों की ये अक्सर मिटा जाते है,
आँखों के इशारे 
जब प्यार की ज़ुबाँ बन जाते है!

जो बयाँ शब्दों से नहीं होता,
जो एहसास बातों में नहीं होता,
अजीब सी कशिश एक दूसरे से मिलने की,
आँखों के इशारे 
पलकों की झपकी में कर जाते है!

यादें, मुलाक़ातें या शोर करते सन्नाटों के दरमियाँ,
दिल के तारों को जोड़ते ये खामोश अफ़साने,
उल्फत की चादर ओढ़े अक्सर क़यामत कर जाते है,
आँखों के इशारे जब 
दो दिलों की एक धड़कन बन जाते है!

~ Sahil
(9th Jan, 2017)

अनकही

कभी-कभी अक्सर एक अजनबी सी खामोशी रह जाती है,
बातें बहुत होती है मगर, वो लबों पर खो जाती है!

कुछ ज़ख्म ऐसे होते है, जो हरे ही रहते है,
वक़्त की चाल जाने अनजाने, ये घांव गहरे कर जाती है!
कभी-कभी बस मुस्कुरा लेना ही लाज़िमी लगता है,
बिन कहे बहुत सी बातें अनजान हो जाती है!
ज़रूरी होता है जीवन में कुछ दर्द छुपा लेना,
रिश्तों के सागर में कुछ कश्तियाँ डूब ही जाती है!

निगाहों का झुक जाना अक्सर शर्म का लिबास नहीं होता,
कोई झाँक ना ले इनकी गहराइयों में,
शायद इसलिए भी ये झुक जाती है!
भीग लेता हूँ बारिश में आजकल,
आँखों की नमी अब इन्हीं के सहारे
छुपते-छुपाते बह जाती है!

ये जान लिया है कि कोई नहीं जाना
शायद इसलिए अब ज़िन्दगी यूँही चलती चली जाती है!
मिल लेता हूं साहिलों से, शामें गुज़ार लेता हूं,
गीली रेत में जो यादों के निशान रख लेता हूं तो,
ये लहरें उन्हें अपने संग ले जाती है!

कभी-कभी अक्सर एक अजनबी सी खामोशी रह जाती है,
बातें बहुत होती है मगर, वो लबों पर खो जाती है!

~ साहिल
(29th January, 2017)

The Last Page!

Flipping through the pages of memory,
I stopped at one point
In the middle of the book.
A page, from where it all started,
It said, “We met”!!!

We met and became friends,
We walked together to every end.
We shared, we fought, we cried,
We tried to make every moment smile.
We were always best together,
But, unfortunately nothing lasts forever!

Picking a pen, something came to my mind,
Instantly i turned to the last page
And started to write…
A page, where it all ends and starts again,
It said, “Until we meet again”!!!

~Sahil
(14th December, 2016)

Karwatein || करवटें

इक हवा का झोंका
छू कर गुज़रता है जैसे,
कुछ लगा ऐसे
कि जैसे गलियों में घूमता हुआ,
नज़रें चुराता, मुझसे, खुदसे,
इक अरसा गुज़र गया।
वो नज़रों में रहनुमा एक साहिल
जहाँ से गुज़रती थी रंगीन शामें,
वो साहिल अब धुंधलाने लगा है।
इन आँखों के परदों ने
कुछ यूँ करवट ली है,
लगा जैसे ज़िन्दगी के कई सपनों में से
इक खूबसूरत मासूम सपना
बह कर गुज़र गया!!!

वो रोज़मर्रा की आदतें
जिसमे तुम्हारी भी आदत शामिल थी,
देखते ही देखते न जाने कब
उन आदतों से रिश्ता टूट गया,
वक़्त ने कुछ इस कदर बदली करवट,
जाने कब हमें अजनबी के दायरे पर ला कर,
वो वक़्त गुज़र गया।
बदलते मौसम की तरह
करवट लेने लगे है वक़्त के तेवर भी आजकल,
कभी खुशियों से बरस आया है
तो कहीं अधूरे से ख्वाब दिखाकर,
वो मौसम गुज़र गया।।।

मैंने लहरों मे उछलते देखा है कश्तियों को,
बड़ी खुन्नस के साथ रुख बदल लेती है
किनारों पर आते ही।
कुछ ऐसा ही हाल देख रहा हूँ,
करवटें बदल कर जी रहा हूँ,
जाने कब कैसे करवट बदलेगी
ये ज़िन्दगी की कश्ती,
सिलवटों के दौर से बसर रहा हूँ।।।

~ साहिल
(11th August, 2016)

भूलना तुम्हें अच्छा नहीं लगता।

तुम कहती हो मुझसे
कि मैं भुला दूँ तुम्हें,
मगर ये भूल जाती हो तुम
भूलना तुम्हें मुझे अच्छा नहीं लगता।।।

लबों पर जो ज़ायका आता था तुम्हारी हंसी का
आँचल में तुम्हारे एक सुकून मिलता था,
छू कर गुजरता वो बचपना जो तुम्हारी मुस्कुराहट से
उस पल मे जैसे खुशनुमा एक ज़माना गुज़रता था।
अब ये होंठ अक्सर सिले से रहते है
बेवजह हँस लेना अब अच्छा नहीं लगता,
भूल जाती हो तुम
भूलना तुम्हें अच्छा नहीं लगता।।।

हाथों में लिए हाथ चले थे साथ साथ
एक नए सफर पर लिखने एक नया अंजाम,
तेरे साथ थी हर राह छोटी और हर मुश्किल आसान
लिख रहे थे दो दिलो के सफरनामा का बखान।
अब तन्हा उन राहो पर अकेला हूं
तेरे बिना सफर करना अच्छा नहीं लगता,
भूल जाती हो तुम,
भूलना तुम्हे अच्छा नहीं लगता।।।

दिन में सोता हूं, रातों मे जागता हूं
ख़्वाबों में तुमसे ही बातें करता हूं,
ये आँखें अब तरसती हैं तेरी एक झलक पाने को
मैं इन्हें तस्वीरों से बहला लेता हूं।
किसीसे मिलना अब अच्छा नहीं लगता
जिस दिन में तू ना हो
उस दिन में उठना अब अच्छा नहीं लगता,
भूल जाती हो तुम,
भूलना तुम्हें अच्छा नहीं लगता।।।

तुम कहती हो मुझसे
कि मैं भुला दूँ तुम्हें,
मगर ये भूल जाती हो तुम
भूलना तुम्हें मुझे अच्छा नहीं लगता।।।


~ साहिल

Naina

ये नैना, वफ़ा करते है
दिल की गहराइयों के गहरे राज़ बयाँ करते है,
एहसासों की सीलन से उधड़े किनारों पर
ये नैना, इकरार करते है!

जब लफ्ज़ साथ ना दे पाये,
एहसासों से सीने में तड़प उठ आये,
और कुछ यादें उथल-पुथल मचाये,
तब अक्सर ये नैना बातें करते है!

पलकों पर रखकर ज़िन्दगी के लम्हें,
कतरों से सींच कर अनकही हसरतें,
कोई अन्जानी दास्ताँ की लहरों में बह कर
अश्क़ों के किनारों पर ये नैना शाम करते है!

ये नैनों के नीचे की गहरी लकीरों में
अफसानों के कारवां बसते है,
जो बह कर छूट गए थे एक रोज़
अब वहीं बैठे इन नैनों में जान भरते है!

कभी जो जलती लौ की तरह
निहारते थे बिन झपके ये नैना,
आज उड़ती हुई हवाओं में झुका कर नज़रें
ये नैना बहाने हज़ार करते है!

ख़्वाबों की ईटों से
जो उम्मीदों के महल बनाते थे,
आज ढूंढते है कुछ शामियाने
ज़रूरतों की चादर ओढ़े ये नैना शबों को निसार करते है!

टूटते सितारों को देखकर
जो दुआएं माँगते थे ये नैना,
कुछ पुरानी मन्नतों के आसमान में
खुद टूट कर नयी ख्वाहिशों में बँट जाते है!

जिन चेहरों को देखकर मन भर लिया करते
और जिनकी बातों में दिन-रात काट लिया करते,
आज उन्हीं चेहरों से ये नैना नज़रें चुराये
छुपने के ठिकाने ढूंढते रहते है!

जब कोई ना हो पास
रख कर पलकों पर कुछ एहसास,
अक्सर बह कर तन्हाइयों के समंदर में
ये नैना किनारे ढूंढते रहते है!

जिन बाहों में रख कर नमी की परतें
ये नैना कतरों को पनाह देते थे,
अब रो लेते है आँखें मीचे
उन बाहों के आँचल को अब तरसा करते है!

ये नैना, वफ़ा करते है
दिल की गहराइयों के गहरे राज़ बयाँ करते है,
एहसासों की सीलन से उधड़े किनारों पर
ये नैना, इकरार करते है!

~ साहिल
(17th March’ 2017 – Friday)

Rango Ka Mela || Happy Holi!

रंगो के इस मेले में
नये रंग उड़ने दो,
भूल कर सारे शिक़वे पूराने
प्यार के रंग भरने दो!

लाल लाल गुलाल में
खुद को लाल रंगने दो,
सारे पुराने रंगो पर
आज नयी लाली चढ़ने दो!

सारे ग़मों के कतरें पुराने
आज ख़ुशी में ढलने दो,
खुशियों के बहाने ले कर
आज मन बहलने दो!

पिचकारी की नोंक पर
आज खुद को भीगने दो,
मन से मैले रंग बहा कर
आज मन को सींचने दो!

आँखों से आँखें चुरा कर
लबों पर सजावट रहने दो,
कतरों को पानी के साथ
आज रंगो में छुप कर बहने दो!

सारी बुराइयाँ, सारी नफरत
आग में झुलसने दो,
इंसानियत के नये रंगो की
दुनिया में सेज सजने दो!

खेल खेल में इस मेले में
खेल के रंग उड़ने दो,
होली के इस मौके पर
रंग संग मन रमने दो!

रंगो के इस मेले में
नये रंग उड़ने दो,
भूल कर सारे शिक़वे पूराने
प्यार के रंग भरने दो!

~ साहिल
(13th March’ 2017)

Wish you all a very happy and colorful holi 🙂 Let your life be full of colors of love, happiness and passion!

Khaamoshi!

Vriksha ki shaakhon par jhuke hue patte,
Jab hawa ke jhonke se gir jate hai…
Wo patte khaamoshi hai!

Jab baadal garaj kar baraste nahi,
Aur dharti pyaasi reh jati hai…
Wo pyaas khaamoshi hai!

Swayam ka saaya bhi saath chhod deta hai,
Jab jeevan uss andheri nagri se guzarta hai…
Wo parcchai khaamoshi hai!

Dil ke raaste se hote hue jo mukh se na nikalkar,
Aankhon ke zariye aansuon me beh jae…
Wo lafz khaamoshi hai!

Wo samandar ka gehraapan khaamoshi hai…
Wo jalti lakdiyon par tap rahi rooh khaamoshi hai…
Wo chuppi, wo nafrat, wo zillat khaamoshi hai…
Bejaan sapno ki wo talab bhi ek khaamoshi hai!

Darr hai kahi ek aag bankar wo sabko jala na jae…
Udte parindo ko raund kar gira na jae…
Aur khilte gulzaar me kahi akaal na le aae…
Jo zinda hai khaamoshi kisi ki khaamoshi me aaj bhi…
Wo zindagi khud ek khaamoshi hai!!!

~ Sahil
(21st March’ 2016)