Zulfein

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों के साये में बिखरा मिलता है मेरा अक्स
यूँ हाथों से सरका कर तुम उलझाया ना करो,
मैं इस कोशिश में कि एक इशारा मिले अगर हवा का
किसी लट में लिपट कर तुम्हारे लबों पर बैठ जाऊं,
बड़ा प्यारा लगता है तेरी साँसों का इत्र पी लेना
यूँ लबों से लटों को उठाया ना करो!

ज़िन्दगी के साये गुम है कहीं
तुम्हारी बाहों से आज़ाद क्या हुए, फिरते रहते है आवारा,
यूँ फैला कर अपनी बाहों की सरगोशियाँ
फिर से बेचैनियाँ बढ़ाया ना करो!

तेरे चेहरे से जग कर हर सुबह ख़्वाब से मिलता हूँ
इन सुबहों में तुम यूँ प्यार बरसाया ना करो,
आदतें तेरी बड़ी नशीली है, लत्त लगी है मुझे तेरी
यूँ बेहया रातों में तुम शर्म का परदे उठाया ना करो!

ज़िन्दगी मुर्शिदा है तेरी हथेली में उम्र भर
यूँ हाथों की लकीरों से मुझे मिटाया ना करो,
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों के साये में बिखरा मिलता है मेरा अक्स
यूँ हाथों से सरका कर तुम उलझाया ना करो!

~ साहिल

(अगस्त 2017)

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Zindagi Abhi Baaki Hai!


जकड़ी हुई हूँ
कुछ रिश्तों के दरमियाँ,
उलझी सी रहती हूँ
खुद से हूँ लापता,
जाने क्या सही है, जाने क्या गलत
ढूंढती हूँ ख्यालों के मेले में, जाने कौनसी हसरत!

ड़र है कि दिल में छुप कर बैठा है
लबों पर कितने ही राज़ दबाये ठहरा है,
ना किसी से कुछ कहा ही जाता है
ना ही खुद को समझाने का जी चाहता है,
बस दिल करता है छोड़ के सब कुछ, तोड़ के सारे बंधन
गिरहों की कैद से आज़ाद हो जाऊ!

ना फ़िक्र हो दुनिया की
ना किसी रिश्ते की ज़रूरत हो,
ये दिल बस साँसें भरता रहे
और ना किसी एहसास की कुर्बत हो,
एक शाम एक किनारे पर सारे कतरें गिरा कर
उन जज़्बातों को कहीं दूर छोड़ आऊ,
खो दिया है खुद को बचपन से निकल कर
ज़रा ढूंढ कर खुद को, खुद से मिल आऊ!

अजनबी सी बेबसी बैठी है दिल में
अजीब सी खामोशी में ढलने लगी हूँ,
जानती हूँ सब कुछ जाने क्यों फिर भी
अन्जान बनने की कोशिश करने लगी हूँ,
ये लम्हें जो बिखरे पड़े है राहों में
इन्हें समेट कर अपने साथ ले जाऊ,
खुद से मिलकर इन लम्हों में
अपने कुछ नये आशियाने सजाऊं!

ना कुछ उलझनें हो, ना कोई शिक़वे
बस खुद को खुद के करीब ले जाऊ,
रिश्तों की सतहों पर अक्सर फिसल जाती हूँ
ज़रा संभल कर जीना सीख जाऊ!

ज़रा सी उलझी, ज़रा जकड़ी हुई, खुद से दूर ज़रूर हूँ मैं
मगर ज़िन्दगी अभी बाकी है, खुशियाँ आगे काफ़ी है, ये भी जानती हूँ मैं।
ज़िन्दगी फिलहाल पहेली है, मगर बहुत ही अच्छी सहेली है
दिल खोल कर ज़िन्दगी से गले मिलना चाहती हूँ मैं,
बस यहीं सोच कर जी लेती हूँ अक्सर,
कि ज़िन्दगी से आशना अभी बाकी है,
ज़िन्दगी मुझमे अभी बाकी है!

– Sahil

(June’ 17)

Ye Raaste!

ये रास्ते थकते नहीं
दौड़ते जाते है दोनों तरफ!

कहीं से आते हुए, कहीं को जाते हुए,
कहीं जुड़ कर मिलते हुए
कहीं टूट कर बिछड़ते हुए,
कहीं आधे-अधूरे, कहीं मिलते है पूरे,
ये रास्ते कहीं रुकते नहीं!

मैं फुटपाथ पर खड़ा सोचता रहता हूँ
आखिर मंज़िल क्या है इन रास्तों की,
ज़िन्दगी में कुछ हौसला मिल जाता
जो मिल जाती फितरत इन रास्तों की!

मगर ये रास्ते थकते नहीं
दौड़ते जाते है दोनों तरफ,
ये रास्ते कहीं रूकते नहीं
चलते जाते है ज़िन्दगी की तरह!

– Sahil

(May’ 17)

Manmarziyaan

दिल की राहों में कबसे बैठी है

थाम कर कितनी गुस्ताखियाँ,

बेअदब ही लिखती जाती है

लफ्ज़ों में स्याही की मनमर्ज़ियाँ!

. . .

खामोशियों के कई सफ़र है

हर सफ़र बस एक डगर है,

बरिशों के मौसम में देखो

भीगना चाहती है बेताबियाँ।

हल्की-हल्की सी बढ़ रही है

साये में घुल के गल रही है,

अश्क़ों की बस यहीं इन्तेहा

निगाहों से बह जाती ये मनमर्ज़ियाँ!

. . .

ख़्वाबों की रातों में उड़ती आती है

ख़्वाबों को मिलती नहीं रज़ा,

तोड़ कर लम्हें रख लेती है करीब अपने

गुज़रे लम्हों की अर्ज़ियाँ।

करवटें बदलती है रात अँधेरे में

लौट के आती है वो तन्हाइयाँ,

आंखों में आँखे डाले जागती रहती है

बड़ी ज़िद्दी, बड़ी बेहया, ये मनमर्ज़ियाँ!

. . .

सफ़हे पलट कर छोड़ जाती है

सफ़हों पर बेरंग निशानियाँ,

सीने पर सिसकती है सारी रहमतें

लबों पर इतराती है कई सुर्खियाँ।

ज़िन्दगी की चौखट पर देखो

बिखरी है कितनी कहानियाँ,

हर कहानी में किरदार है पहला

ये शोर मचाती मनमर्ज़ियाँ!

. . .

दिल की राहों में कबसे बैठी है

थाम कर कितनी गुस्ताखियाँ,

बेअदब ही लिखती जाती है

लफ्ज़ों में स्याही की मनमर्ज़ियाँ!

. . .

– Sahil

(25th August, 2017)

Kuch Ajeeb sa hai ye Waqt!

कुछ अजीब सा है ये वक़्त!

रुकता भी नहीं है,

और गुज़रता चला जाता है।

कुछ लम्हों के सिरहाने रात काट लेता है

कुछ ज़रूरतों के मकान में करवटें बदलता मिल जाता है,

कुछ अजीब सा है ये वक़्त!

रुकता भी नहीं है,

और गुज़रता चला जाता है।

~

अटका रहता है पेड़ की एक डाली पर

हवा के झोंको में झूलता जाता है,

वहीं मोड़ पर पहरा देता है

और नये मोड़ मुड़ता चला जाता है!

ये वक़्त कहीं था तो सही पर जाने कहाँ, किसे पता,

ये वक़्त कहीं तो होगा पर जाने कहाँ, किसे पता,

कुछ किस्सों में लिपट कर सुकून से सो जाता है

कुछ हिस्सों में बँट कर आधा-अधूरा रह जाता है,

ज़िन्दगी जैसे चलती है

वक़्त भी चलता जाता है,

धीरे-धीरे सब कुछ सिर्फ एक कारवाँ कहलाता है,

कुछ अजीब सा है ये वक़्त!

रुकता भी नहीं है,

और गुज़रता चला जाता है।

~

रेत ओढ़ कर उड़ता है

एहसासों के समंदर पर चलता है,

ज़िन्दगी की राहों में हर कदम

बेवजह की वजहें भरता है,

साँसें कहीं दबी है मगर

फिर भी साँसें भरता है,

ये वक़्त का घड़ा है

लम्हें चुन-चुन कर भरता है!

कुछ यादें है जिनमें उलझता जाता है

कुछ शिकवों की कसक में कराहता जाता है,

कोई कहानी है अन्जानी सी या

खाली कोई पन्ना नज़र आता है,

कुछ अजीब सा है ये वक़्त!

रुकता भी नहीं है,

और गुज़रता चला जाता है।

~

कुछ लम्हों के सिरहाने रात काट लेता है

कुछ ज़रूरतों के मकान में करवटें बदलता मिल जाता है,

कुछ अजीब सा है ये वक़्त!

रुकता भी नहीं है,

और गुज़रता चला जाता है।

~

– साहिल

(16th August, 2017)

Karawaan 70 ka || Mera Desh

ये कारवाँ अब 70 का हो चुका है

चलते-चलते कई इतिहास रच चुका है,

कई रंगों में घुल कर कितना रंगीन लगने लगा है

मेरा देश अब एक नये सफर पर चल पड़ा है!

~

दिशा नई है, नई सोच से सींची हुई

उमंगे जवाँ है, इरादों के धागों से बुनी हुई,

दुनिया के हर चहरे पर अपना नाम लिख कर

देश का हर कोना अब चमकने लगा है,

बुलंद है हर चाल इसकी

ज़माने के बदलते तेवर में ढलने लगा है,

सोने की चिड़िया कैद थी जिन पिंजरों में

आज उन्हीं पिंजरों पर अपनी पकड़ रखने लगा है,

ये धरती है जहा से दुनिया ने जन्म लिया

जहाँ से हर उम्मीद, हर एहसास ने रूप लिया,

सारे जहाँ से बेहतर ये जहाँ हमारा

अब मिसाल बन हर ज़ुबाँ पर मिलने लगा है,

मेरा देश अब एक नये साँचे में ढलने लगा है,

ये कारवाँ अब 70 का हो चुका है!

~

रीत-रिवाज़ों में उलझा था कभी

सोच की हदों पर पहरा था कभी,

आसमान छूने की ताक़त है इसमें

फिर भी ज़मीन पर बिखरा था कहीं,

अंधेरों के मौसम अब बीतने लगे है

गिरहों को खोल कर सुलझने लगा है,

हर तरफ से सवेरा दिखने लगा है

मेरा देश बदलने लगा है!

फक्र से सिर ऊंचा उठता है

तिरंगे को देखकर गर्व होता है,

भारतीय होना अपने आप में एक वरदान है

भारत देश खुद में एक भगवान है,

लबों पर ज़ायका “इंडिया” का मिलने लगा है

मेरा देश अब हर दिल में धड़कने लगा है,

ये कारवाँ अब 70 का हो चुका है!

~

शहीदों की शहादत आज भी याद आती है तो खून खौल उठता है,

पुराने ज़ख्म भरे नहीं, हिसाब पूरा करने को मन करता है,

आज़ादी की लड़ाई में जो वीरगति को प्राप्त हुए उन्हें सारा देश नमन करता है,

सात दशक आज़ादी के बीत गये

फिर भी हर साल वही जोश, वही जुनून मिलता है!

अब कवायद है नयी उम्मीद की

अमन और खुशी के रास्ते पर ज़रूरत है मानवता बनाये रखने की,

आज़ाद हुए अंग्रेज़ों के हाथों

अब आज़ाद होना है खुद की सलाखों से,

आओ मिलकर फिर से लिखे कहानी नये भारत की!

एकता में अनेकता का प्रतीक-

मेरा देश अब आज़ादी की नयी परिभाषा लिखने लगा है,

मेरा देश अब सही मायनों में आज़ाद होने को चला है!

~

ये कारवाँ अब 70 का हो चुका है

चलते-चलते कई इतिहास रच चुका है,

कई रंगों में घुल कर कितना रंगीन लगने लगा है

मेरा देश अब एक नये सफर पर चल पड़ा है!

~

Happy Independence Day 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

– Sahil

(15th August, 2017)

Dosti ke Kinaare!

उमंगो की लहरें बहती जाती है

ख़्वाहिशों की कश्तियाँ दौड़ लगाती है,

थम कर कुछ देर ये एहसासों की रेत

दोस्ती के किनारे कुछ लम्हें सजाती है!

. . .

जश्न मनाती है शामें उतरकर

आफ़ताब का हल्का कश लगाती है,

बैठ कर अक्सर ज़िन्दगी के मौसम में ये

दोस्ती के किनारे रिश्ते बनाती है!

. . .

सारे शिक़वे, सारे अँधियारे

अन्दर छुपे गहरे राज़ सारे,

थाम कर अपने आँचल में, कुछ यूँ सुलाती है

दोस्ती के किनारे अक्सर खुद से मिलाती है!

. . .

किसी मंज़िल का अजनबी रास्ता है ये

ज़िन्दगी में ज़िन्दगी का वास्ता है ये,

दूरियों में नज़दीकियाँ बनाती है

दोस्ती के किनारे कितनी कहानियाँ बन जाती है!

. . .

मिलता नहीं वो एहसास किसी रिश्ते में

जो करिबियाँ दोस्ती ले आती है,

चाहे जैसे हो, जो हो, वक़्त और हालात

दोस्ती के किनारे ज़िन्दगी मिल जाती है!

. . .

ये दिन दोस्ती का नहीं, दोस्ती से ये दिन है

हर पल, हर दम, यारियों का मौसम है,

ओढ़ कर चुनर खुशियों के फ़लक की

दोस्ती के किनारे हसरतें डूबकी लगाती है!

. . .

शुक्रिया कहना लाज़िमी ना होगा

दोस्ती कहाँ किसी दायरे में सिमट पाती है,

ये समंदर है ज़िन्दगी के जहाँ कश्तियाँ अक्सर अंधेरों में

दोस्ती के किनारे सुकून से ठहर जाती है!

. . .

#FriendshipDay2017

– साहिल

(5th August, 2017)


Will you fix me?

Will you fix me?
In the darkest of nights
Or the bright moon light,
In the closet of your arms every morning
Or the harsh moments of life…
Will you fix me?
When I feel like there is no more hope to survive,
When everything fades away and only shades reside,
When the heart beats fast along the memory rides
And eyes tend to break out and hide…
Will you fix me???

On the periphery of life, there will be moments when I will be low
Among the various faces of mine, there will be a face I will rarely show,
At times I will get into a zone where I will dismay every feel
At times I will be difficult to handle and to deal,
More often you’ll see me dragging myself into me
More often you’ll find an altogether different me,
Sometimes I’ll give the most positive vibes
And there will be days when negativity will bring the worst out of me!
During those bad times
When everything will seem to sublime,
When days will go without talking
And you’ll find nights boring,
Instead of giving up on me
Instead of making inferences out of me,
During those weak moments of life…
Will you fix me?

– Sahil
(28th June, 2017)

Kehte Suna Hai!

कहते है हर किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,
किसी को ज़मीन तो किसी को आसमान नहीं मिलता!

ज़िन्दगी का ये सफर बस चलता रहता है,

किसी के जाने से नहीं रुकता

या किसी के आने से नहीं बदलता!

दिल धड़कता रहता है और साँसें चलती रहती है

मौत आने से पहले ये कारवाँ नहीं रुकता!

रिश्तों के मांझी अक्सर खो जाने की दुहाई देते है,

ज़िन्दगी के सागर में हर रिश्ता किनारा नहीं लगता!

पलटते जाते है सफर में सफहे

यादों की स्याही से फैलते जाते है,

कोई गुज़रा हुआ पल फिर से नहीं लिखता!

वक़्त अपनी गति से चलता जाता है,

किसी के ठहर जाने से वक़्त नहीं ठहरता!

जो खो गया वो खो गया,

ढूंढने पर वो इंसान फिर नहीं मिलता!

कहते सुना है मैने लोगों को,

ज़िन्दगी में चाहतों को हमेशा ज़रिया नहीं मिलता!


~ Sahil
(4th January, 2017)


Two silent moments!

एक बेपनाह खामोशी
एक गहरा सूनापन
एक लम्बी सी तन्हाई थी
दो लम्हों के दरमियाँ,
कहने को बहुत कुछ था
मगर लफ़्ज़ों में साँसें भर आई थी!

आहें निकलती रही
आंसू टपकते रहे
आवाज़ का अंदाज़ भी बदल चुका था,
दोनों को एहसास था 
फिर भी अजनबी सा हर एक अलफ़ाज़ था,
वाकिफ थे एक दूसरे की हर आहट से
फिर भी लबों पर झूठा इत्तेफ़ाक़ था!

कई बातें अब राज़ बन चुकी थी
सिलसिलों की रातें अब ख़्वाब बन चुकी थी,
गुज़रते वक़्त की दहलीज़ पर
जाने कितनी मरतबा ये धड़कन साथ छोड़ चुकी थी,
उस एक सन्नाटे में उम्र भर की हार मिली थी
लफ़्ज़ों की बंदिश में ज़िन्दगी बिछड़ रही थी,
बेबसी का आलम था दो लम्हों की जुस्तजू में
मीलों के फासलों में भी इनको कोई आह चुभी थी!

एक बेपनाह खामोशी
एक गहरा सूनापन
एक लम्बी सी तन्हाई थी
दो लम्हों के दरमियाँ,
एक दूसरे का आइना थे जो कभी
आज अजनबी सी लगती परछाई थी!


~ साहिल
(15th January, 2017)