Shor – The Call!

एक शोर सुनाई देता है
तल्खियाँ कई सारी घेरे रहती है,
उलझनों के साये मिलते है हर तरफ
होठों पर मुस्कुराहट की नमी रहती है!

कुछ बातें है जो अब सताने लगी है
रात की खामोशियाँ कुछ शिकवें सुनाने लगी है,
आहें भर कर वक़्त काट लेती हूँ
ज़िन्दगी अब बड़े होने के तरीके सिखाने लगी है!

अब ड़र नहीं लगता लोगों से मिलने में
अपनों को मिलने से लगता है,
आँखो में जो भर रखे है कई राज़
कोई पढ़ ना ले इन्हें, इस बात का डर लगता है!

गले मिल लेती हूँ, फर्क नहीं पड़ता
ग़म में मुस्कुराना अब मुश्किल नहीं लगता,
बेअदब लगने लगे है ये एहसासों के मुसाफ़िर
दिल का हाल बताना अब ज़रूरी नहीं लगता!

एक गूँज सुनाई देती है चारों ओर
एक चीख़ हर पल चीख़ती रहती है,
एक शोर कहीं से आवज़ें देता रहता है
किसी से बातें करने का अब मन नहीं करता!

ज़िन्दगी कुछ इस कदर उलझ चुकी है
अब खुद से मिलने का वक़्त नहीं मिलता!

– Sahil

(September 2017)

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Wajah!

चल लेता हूँ कुछ बेखबर राहों पर
बेवजह कुछ साँसे भरता हूँ,
मिलती नहीं कोई वजह ज़माने में
अब तन्हा सफ़र मैं हर दफ़ा कर लेता हूँ!

लम्हों के मुसाफ़िर पुकारते है मुझे
बड़ी बेसब्री से ढूंढते है,
मैं कोशिश करता हूँ कि मुड़ कर ना देखूँ
अब पलटने की कोई वजह नहीं मिलती!

सारी ख़्वाहिशें, सारे अरमान
कहीं छोड़ आया मैं वो सारे सामान,
ज़रूरतों का एक बैग उठा कर हर रोज़ निकल पड़ता हूँ
अब हसरतें सजाने की वजह नहीं मिलती!

रिश्तों के किनारे डूब गये पिछली बार
एहसासों को पनाह नहीं मिलती,
मैं ज़िन्दगी में गले तक डूब गया था
मगर ज़िन्दगी से मेरी अब नहीं बनती!

लिपट कर सो जाती है तन्हाईयाँ बाहों में
मैं रातों में जाग कर कुछ अंधेरे पढ़ लेता हूँ,
वजह नहीं कोई सफहे पलटने की
फिर भी बेवजह मैं अधूरे फसाने पढ़ लेता हूँ!

चल लेता हूँ कुछ बेखबर राहों पर
बेवजह कुछ साँसे भरता हूँ,
मिलती नहीं कोई वजह ज़माने में
अब तन्हा सफ़र मैं हर दफ़ा कर लेता हूँ!

– साहिल
(12th September, 2017 – Tuesday)

Ye Waqt!

ये वक़्त कहाँ से चला था, ये वक़्त कहाँ को जाता है,
मैने जब से होश सम्भाला, ये वक़्त चलता ही जाता है!

बिन चाबी का कोई खिलौना जैसे
चक्का घूमता ही जाता है,
ना थकता है, ना रुकता है
बेसब्रियों में दौड़ता जाता है;
मैं पूछ लेता हूँ अक्सर वक़्त के काफिलों से
हर कोई चुप-चाप चलता जाता है,
ये वक़्त कहाँ से चला था, ये वक़्त कहाँ को जाता है
मैने जब से होश सम्भाला, ये वक़्त चलता ही जाता है!

बचपन वाले दिन जो बीते
आँखों को भिगोता लाता है,
खो गया वो खूबसूरत पल जो
यादों में हर रोज़ आता है;
गुज़रे कल जो धुंधलाने लगते है
तस्वीरों के बहाने दिखाता है,
बारिशों के मौसम या पतझड़ का सावन हो
ये वक़्त चलता ही जाता है;
एक रोज़ कहीं खो गया था
जाने अब कहाँ ले जाता है,
ये वक़्त कहाँ से चला था, ये वक़्त कहाँ को जाता है,
मैने जब से होश सम्भाला, ये वक़्त चलता ही जाता है!

– Sahil

(30th May, 2017 – Tuesday)

Bachpan Ka Sheher

चार दिन का इतवार है यारों
क्यों ना इस बार मौज मनाये,
उन गलियों में फिर से शोर मचाये
चलो फिर बचपन के शहर जाये!

गले मिले उन शामों से
और सुबह को अंगड़ाइयाँ भर कर फिर सो जाये,
ख़्वाहिशों के आशियाने में लौट जाये
चलो फिर बचपन के शहर जाये!

खेल पुराने दिनों के खेलेंगे
लुका-छुपी में नए कोने देखेंगे,
घर के खाने की खुशबू मन ललचायेगी
सारी बेताबियाँ सुकून से सो जायेगी।
नये इरादे फिर नये सिरे से जोड़ेंगे
ख़्वाबों की पतंग में रिश्तों के धागे जोड़ेंगे,
हसरतें सारी इन पलकों पर फिर लौट आयेगी
धीरे-धीरे बचपन के किस्से खोलेंगे।
नन्हे-से कदम अब भी वही जमे है
ज़रूरतों की राहें इनसे मिलने ना पाये,
कुछ रोज़ ज़िन्दगी से चलो रूबरू हो जाये
चलो फिर बचपन के शहर जाये!

कुछ बन्द पड़े बक्से यादों के खोलेंगे
कुछ छोटे-छोटे किस्से लबों पर डोलेंगे,
फिर से एक बार वही बेफ़िक्री की डालियों पर
बांध कर डोर एहसासों की, मौसम की बाहों में झूलेंगे!
रात की चांदनी में, तारों की महफ़िल में
खोलकर गिरहें हम बेपनाह दौड़ेंगे,
बहुत देर हुई सुकून की चादर ओढ़े
लौट कर एक दफा फिर से ख़ुशियों के लिफ़ाफे खोलेंगे!
पल-पल बदलती दुनिया में यारों
देखो ये बचपन कहीं छूट ना जाये,
वजूद की मिट्टी का तिलक लगाने
चलो फिर बचपन के शहर जाये!

सारी फिक्रें भूल कर दोस्तों
चलो खुद से मिल कर आये,
वक़्त के सफ़र में आराम नहीं होता
चलो फिर बचपन के शहर जाये!

चार दिन का इतवार है यारों
क्यों ना इस बार मौज मनाये,
उन गलियों में फिर से शोर मचाये
चलो फिर बचपन के शहर जाये!

– साहिल
(17th October, 2017 – Tuesday)

Khayaalon Ki Duniya Ka Ek Musafir!

रात की खामोशी के चादर तले
कुछ हलचल हुई थी,
कई ख्याल बिखरे पडे थे
कई लम्हों की आँखे शर्मसार हुई थी,
एक नमी इन पलकों पर भी आ कर ठहरी थी
साँसों ने भी दबी-दबी सी आहें भरी थी!

वो जो लम्हा था
अक्सर मुझसे रातों में मिलता,
खुश रहने की बातें करता
बेफ़िक्रियों के बहाने करता,
और एक मुस्कुराहट को अपने साथ लिये घूमता।

वो अक्सर ले जाता मुझे अपने साथ
उसके घर में सुकून का एहसास होता,
चाहतें लिपट जाती सीने से
और खुशियाँ ज़ायका रख देती मेरे लबों पर,
शायद ही कोई इंसान होगा
जो उसकी तरह ज़िन्दगी से गले लगता।

सुना है,

वो ख़्यालों की दुनिया का एक मुसाफ़िर,
जो ज़िन्दगी के हर पल को बड़े प्यार से संवारता…
गई रात गिर गया था अपने ही सपनों की ऊंचाइयों से
करवट बदलते-बदलते!

मोहबब्त थी उसे ज़िन्दगी से
बड़ी लालसा थी उसे जीने की,
वो ज़िन्दगी को करीब से जानना चाहता था।
वो ज़िन्दगी का प्यारा
ख़्यालों की दुनिया का एक मुसाफ़िर…
गई रात ज़िन्दगी को ही प्यारा हो गया!

रात की खामोशी के चादर तले
कुछ हलचल हुई थी!

कई ख्याल बिखरे पडे थे
कई लम्हों की आँखे शर्मसार हुई थी,

~ साहिल

(मई २०१७)

Kuch Rang Aise Bhi!

Kayi chehron par aaj rang laga hai
Laal, hare, gulaabi, neele rangon ka jaise mela laga hai,
Kahi gulaal se toh kahi pani se har koi rangaa hai
Umang aur josh aaj sabhi ke chehre par khil raha hai!

Magar kahi kuch chehre maayusi ke ghar me gum hai
Kya holi, kya diwali…unke liye toh do waqt ki roti aur footpath ki neend ka mausam hai,
Iss holi, uss bejaan mausam me khushi ke gulaal unke jeevan me lagae jao
Kyu na iss baar khushiyon ke kuch rang aise bhi, un chehron par bikher jao!!!

Prateek hai tyohaar acchai aur sacchai ka
Sandesh deta hai burai ke andhkaar ko jalaane ka,
Iss holi apne andar ki insaaniyat ko jagae jao
Rishwat ka len-den na ho,
Kisi ke sankat me sirf darshak na ho
Koi galat ho toh uske khilaaf aawaaz buland ho,
Madad karne ko hamesha dil se tayyar ho,
Ho sake toh iss baar acchai ke kuch rang aise bhi, apne mann par lagae jao!!!

Hansi ki bauchhar ho, aankhon me jhalakte sitaare ho
Har taraf bas pyaar aur khushiyon ki bahaarein ho,
Sirf laal, hare, gulaabi ya neele hi nahi
Duaa hai iss baar khushiyon ke hazaaron rang aise bhi, har ek chehre par jagmaga rahe ho!!!

Happy Holi

होली पर्व की आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें 🙂

~ Sahil

(March 2016)

Baatein Tumhari!

तुम्हारे पिघले-पिघले से लबों पर
कशिश की एक बूँद कब से ठहरी हुई,
मेरे लबों की प्यास बढ़ा रही है!

तुम्हारी गीली रेशमी ज़ुल्फें जो बंधी है एक दूसरे से
खुलने को बेताब मेरी उँगलियों से,
शर्म के ये परदे गिराने को घटायें छा रही है!

मेरे करीब आने पर तुम्हारी गहराती साँसें और बेसब्र आहें
मेरी साँसों में इत्र तुम्हारी महक का घोल कर,
निशाओं में मदहोशी के जाम छलका रही है!

मेरी हथेलियों की नरमी जब छूती है तुम्हारे कमरबन्द छल्ले
तो तुम्हारे जिस्म की बेहिसाब इठलनें और करवटें,
मेरी हाथों की सख्ती कमर पर और बढ़ा रही है!

तुम्हारे नूर का लिबास पहने इक झोंका इश्क़ का
मेरे दिल पर अक्सर खटखटाता है,
धड़कनें मेरी तुम्हारे ज़िक्र से तेज़ होती जा रही है!

नैनों में घुलते तुम्हारे हूर और हया के शबाब में
मुहब्बत के जाने कितने दरिया समाये है,
इन पलकों के किनारों पर उछलती इशारों की लहरें मेरी बेताबियाँ बढ़ा रही है!

मेरी बाहों में जब टूट जाती है तुम्हारी बाहें
सीने पर कम्पन्न उठता है तुम्हारी साँसों का,
लिपट कर तुम्हारे रूही एहसास मुझे अन्जानी सी कोई कहानी सुना रही है!

तुम्हारे करीब रहकर ये यकीन मिलता है
ज़िन्दगी में ज़िन्दगी का नसीब मिलता है,
बातें तुम्हारी आजकल मेरे दिन और रातों को शबनमी बना रही है!

कुछ तो दास्ताँ है तुम्हारी
जो तुम्हारी आँखें मुझसे कहती जा रही है,
कुछ तो बात है तुम में
जो तुम्हारी तरफ मुझे खींचे जा रही है,
बातें तुम्हारी आजकल मेरे लबों पर करवटें लेती लकीरें बिछा रही है!

~ साहिल

Agar Tum…Toh Mein!

अगर तुम लफ्ज़ हो
तो मैं गीत बन जाता हूँ,
चलो मिलकर ग़ज़ल बनाते है!

अगर तुम लहर हो
तो मैं साहिल बन जाता हूँ,
चलो मिलकर दरिया बनाते है!

अगर तुम दिल हो
तो मैं धड़कन बन जाता हूँ,
चलो मिलकर रिश्ता बनाते है!

अगर तुम ख़्वाब हो
तो मैं कलम बन जाता हूँ,
चलो मिलकर दास्ताँ बनाते है!

अगर तुम दुआ हो
तो मैं मक़बूल हो जाता हूँ,
चलो मिलकर ज़िन्दगी बनाते है!

~ साहिल

(२१ दिसम्बर, २०१६)

Tum Hanste Rehna!

चाहे जितने ग़म हो
चाहे ये आँखे नम हो,
वो पल फिर भी तुम जी लेना
तुम हँसते रहना!

चाहे कोई बात सताये
चाहे कुछ पीछे छूट जाये,
जो हासिल है उसे थाम कर रखना
तुम हँसते रहना!

कोई बात हो कहनी और अगर ये लब कह ना पाये
या कोई राज़ हो गहरा जो ये आँखे सम्भाल ना पाये,
बेफ़िक्र हो कर तुम मुझसे कह देना
लेकिन तुम कभी उदास मत होना,
तुम हँसते रहना!

मुमकिन है कुछ ख़्वाहिशें टूट जाये ज़िन्दगी के सफर में
और कुछ सपने शायद पीछे छूट जाये,
कई पुरानी बातें हो सकता है तुम्हें किसी रोज़ याद आये
और एहसासों के साहिल पर लहरें अक्सर शोर मचाये,
तुम कुछ देर रुक कर साहिल पर
फिर से अपने रास्ते चल लेना,
कुछ बातें बता कर, कुछ यादें बाँट कर
तुम मन हल्का कर लेना,
और फिर चेहरे पर वहीं मुस्कुराहट रख कर
तुम हँसते रहना!

बड़ा ज़रूरी है इस दुनिया में
तुम भी कोई नक़ाब सबके सामने पहन लेना,
कोई पूछे तुम्हें तुम्हारा हाल
तुम भी सबकी तरह मुस्कुरा कर “बस ठीक” कह देना,
कभी फुरसत मिले तो कुछ देर ज़रा अपने लिए भी जी लेना
बहुत मिलेंगे तुम्हें ग़म इन राहों में,
मगर हर ग़म को तुम खुशी-खुशी पी लेना,
हर हाल में बस
तुम हँसते रहना!

चाहे जितने ग़म हो
चाहे ये आँखे नम हो,
वो पल फिर भी तुम जी लेना
तुम हँसते रहना!

– साहिल
(9 अक्टूबर, 2017 – रविवार)

Tiranga!

सुनहरी सी चुनर ओढ़े
आसमान मुस्कुराता रहा,
हर ख़्वाब में भर कर कुछ रंग
हवाओं संग इतराता रहा,
उड़ान भर कर आज पंछी भी
बेखौफ़ से खेल रहे,
दुनिया में आज सबसे ऊपर
तिरंगा लहरा रहा!

श्वेत से एहसासों में
रम गया है हर एक मन,
चेहरे पर चढ़ने लगा है
स्वाधीनता का बस एक ही रंग,
एकता से सराबोर
आज सारे भारत में जश्न हो रहा,
दुनिया में आज सबसे ऊपर
तिरंगा लहरा रहा!

हरे-हरे से सारे इरादों में
हरित हो गया है हर शहर,
उठने लगी है हर तरफ़ से
देश प्रेम की लहर,
हर एक दिल आज
खुशी से झूम रहा,
दुनिया में आज सबसे ऊपर
तिरंगा लहरा रहा!

*स्वाधीनता दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं!

#RepublicDay2018

~ Sahil
(26th January, 2018 – Friday)