अनकही

कभी-कभी अक्सर एक अजनबी सी खामोशी रह जाती है,
बातें बहुत होती है मगर, वो लबों पर खो जाती है!

कुछ ज़ख्म ऐसे होते है, जो हरे ही रहते है,
वक़्त की चाल जाने अनजाने, ये घांव गहरे कर जाती है!
कभी-कभी बस मुस्कुरा लेना ही लाज़िमी लगता है,
बिन कहे बहुत सी बातें अनजान हो जाती है!
ज़रूरी होता है जीवन में कुछ दर्द छुपा लेना,
रिश्तों के सागर में कुछ कश्तियाँ डूब ही जाती है!

निगाहों का झुक जाना अक्सर शर्म का लिबास नहीं होता,
कोई झाँक ना ले इनकी गहराइयों में,
शायद इसलिए भी ये झुक जाती है!
भीग लेता हूँ बारिश में आजकल,
आँखों की नमी अब इन्हीं के सहारे
छुपते-छुपाते बह जाती है!

ये जान लिया है कि कोई नहीं जाना
शायद इसलिए अब ज़िन्दगी यूँही चलती चली जाती है!
मिल लेता हूं साहिलों से, शामें गुज़ार लेता हूं,
गीली रेत में जो यादों के निशान रख लेता हूं तो,
ये लहरें उन्हें अपने संग ले जाती है!

कभी-कभी अक्सर एक अजनबी सी खामोशी रह जाती है,
बातें बहुत होती है मगर, वो लबों पर खो जाती है!

~ साहिल
(29th January, 2017)

The Last Page!

Flipping through the pages of memory,
I stopped at one point
In the middle of the book.
A page, from where it all started,
It said, “We met”!!!

We met and became friends,
We walked together to every end.
We shared, we fought, we cried,
We tried to make every moment smile.
We were always best together,
But, unfortunately nothing lasts forever!

Picking a pen, something came to my mind,
Instantly i turned to the last page
And started to write…
A page, where it all ends and starts again,
It said, “Until we meet again”!!!

~Sahil
(14th December, 2016)

Karwatein || करवटें

इक हवा का झोंका
छू कर गुज़रता है जैसे,
कुछ लगा ऐसे
कि जैसे गलियों में घूमता हुआ,
नज़रें चुराता, मुझसे, खुदसे,
इक अरसा गुज़र गया।
वो नज़रों में रहनुमा एक साहिल
जहाँ से गुज़रती थी रंगीन शामें,
वो साहिल अब धुंधलाने लगा है।
इन आँखों के परदों ने
कुछ यूँ करवट ली है,
लगा जैसे ज़िन्दगी के कई सपनों में से
इक खूबसूरत मासूम सपना
बह कर गुज़र गया!!!

वो रोज़मर्रा की आदतें
जिसमे तुम्हारी भी आदत शामिल थी,
देखते ही देखते न जाने कब
उन आदतों से रिश्ता टूट गया,
वक़्त ने कुछ इस कदर बदली करवट,
जाने कब हमें अजनबी के दायरे पर ला कर,
वो वक़्त गुज़र गया।
बदलते मौसम की तरह
करवट लेने लगे है वक़्त के तेवर भी आजकल,
कभी खुशियों से बरस आया है
तो कहीं अधूरे से ख्वाब दिखाकर,
वो मौसम गुज़र गया।।।

मैंने लहरों मे उछलते देखा है कश्तियों को,
बड़ी खुन्नस के साथ रुख बदल लेती है
किनारों पर आते ही।
कुछ ऐसा ही हाल देख रहा हूँ,
करवटें बदल कर जी रहा हूँ,
जाने कब कैसे करवट बदलेगी
ये ज़िन्दगी की कश्ती,
सिलवटों के दौर से बसर रहा हूँ।।।

~ साहिल
(11th August, 2016)