Kuch Ajeeb sa hai ye Waqt!

कुछ अजीब सा है ये वक़्त!

रुकता भी नहीं है,

और गुज़रता चला जाता है।

कुछ लम्हों के सिरहाने रात काट लेता है

कुछ ज़रूरतों के मकान में करवटें बदलता मिल जाता है,

कुछ अजीब सा है ये वक़्त!

रुकता भी नहीं है,

और गुज़रता चला जाता है।

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अटका रहता है पेड़ की एक डाली पर

हवा के झोंको में झूलता जाता है,

वहीं मोड़ पर पहरा देता है

और नये मोड़ मुड़ता चला जाता है!

ये वक़्त कहीं था तो सही पर जाने कहाँ, किसे पता,

ये वक़्त कहीं तो होगा पर जाने कहाँ, किसे पता,

कुछ किस्सों में लिपट कर सुकून से सो जाता है

कुछ हिस्सों में बँट कर आधा-अधूरा रह जाता है,

ज़िन्दगी जैसे चलती है

वक़्त भी चलता जाता है,

धीरे-धीरे सब कुछ सिर्फ एक कारवाँ कहलाता है,

कुछ अजीब सा है ये वक़्त!

रुकता भी नहीं है,

और गुज़रता चला जाता है।

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रेत ओढ़ कर उड़ता है

एहसासों के समंदर पर चलता है,

ज़िन्दगी की राहों में हर कदम

बेवजह की वजहें भरता है,

साँसें कहीं दबी है मगर

फिर भी साँसें भरता है,

ये वक़्त का घड़ा है

लम्हें चुन-चुन कर भरता है!

कुछ यादें है जिनमें उलझता जाता है

कुछ शिकवों की कसक में कराहता जाता है,

कोई कहानी है अन्जानी सी या

खाली कोई पन्ना नज़र आता है,

कुछ अजीब सा है ये वक़्त!

रुकता भी नहीं है,

और गुज़रता चला जाता है।

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कुछ लम्हों के सिरहाने रात काट लेता है

कुछ ज़रूरतों के मकान में करवटें बदलता मिल जाता है,

कुछ अजीब सा है ये वक़्त!

रुकता भी नहीं है,

और गुज़रता चला जाता है।

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– साहिल

(16th August, 2017)

Karawaan 70 ka || Mera Desh

ये कारवाँ अब 70 का हो चुका है

चलते-चलते कई इतिहास रच चुका है,

कई रंगों में घुल कर कितना रंगीन लगने लगा है

मेरा देश अब एक नये सफर पर चल पड़ा है!

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दिशा नई है, नई सोच से सींची हुई

उमंगे जवाँ है, इरादों के धागों से बुनी हुई,

दुनिया के हर चहरे पर अपना नाम लिख कर

देश का हर कोना अब चमकने लगा है,

बुलंद है हर चाल इसकी

ज़माने के बदलते तेवर में ढलने लगा है,

सोने की चिड़िया कैद थी जिन पिंजरों में

आज उन्हीं पिंजरों पर अपनी पकड़ रखने लगा है,

ये धरती है जहा से दुनिया ने जन्म लिया

जहाँ से हर उम्मीद, हर एहसास ने रूप लिया,

सारे जहाँ से बेहतर ये जहाँ हमारा

अब मिसाल बन हर ज़ुबाँ पर मिलने लगा है,

मेरा देश अब एक नये साँचे में ढलने लगा है,

ये कारवाँ अब 70 का हो चुका है!

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रीत-रिवाज़ों में उलझा था कभी

सोच की हदों पर पहरा था कभी,

आसमान छूने की ताक़त है इसमें

फिर भी ज़मीन पर बिखरा था कहीं,

अंधेरों के मौसम अब बीतने लगे है

गिरहों को खोल कर सुलझने लगा है,

हर तरफ से सवेरा दिखने लगा है

मेरा देश बदलने लगा है!

फक्र से सिर ऊंचा उठता है

तिरंगे को देखकर गर्व होता है,

भारतीय होना अपने आप में एक वरदान है

भारत देश खुद में एक भगवान है,

लबों पर ज़ायका “इंडिया” का मिलने लगा है

मेरा देश अब हर दिल में धड़कने लगा है,

ये कारवाँ अब 70 का हो चुका है!

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शहीदों की शहादत आज भी याद आती है तो खून खौल उठता है,

पुराने ज़ख्म भरे नहीं, हिसाब पूरा करने को मन करता है,

आज़ादी की लड़ाई में जो वीरगति को प्राप्त हुए उन्हें सारा देश नमन करता है,

सात दशक आज़ादी के बीत गये

फिर भी हर साल वही जोश, वही जुनून मिलता है!

अब कवायद है नयी उम्मीद की

अमन और खुशी के रास्ते पर ज़रूरत है मानवता बनाये रखने की,

आज़ाद हुए अंग्रेज़ों के हाथों

अब आज़ाद होना है खुद की सलाखों से,

आओ मिलकर फिर से लिखे कहानी नये भारत की!

एकता में अनेकता का प्रतीक-

मेरा देश अब आज़ादी की नयी परिभाषा लिखने लगा है,

मेरा देश अब सही मायनों में आज़ाद होने को चला है!

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ये कारवाँ अब 70 का हो चुका है

चलते-चलते कई इतिहास रच चुका है,

कई रंगों में घुल कर कितना रंगीन लगने लगा है

मेरा देश अब एक नये सफर पर चल पड़ा है!

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Happy Independence Day 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

– Sahil

(15th August, 2017)

Dosti ke Kinaare!

उमंगो की लहरें बहती जाती है

ख़्वाहिशों की कश्तियाँ दौड़ लगाती है,

थम कर कुछ देर ये एहसासों की रेत

दोस्ती के किनारे कुछ लम्हें सजाती है!

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जश्न मनाती है शामें उतरकर

आफ़ताब का हल्का कश लगाती है,

बैठ कर अक्सर ज़िन्दगी के मौसम में ये

दोस्ती के किनारे रिश्ते बनाती है!

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सारे शिक़वे, सारे अँधियारे

अन्दर छुपे गहरे राज़ सारे,

थाम कर अपने आँचल में, कुछ यूँ सुलाती है

दोस्ती के किनारे अक्सर खुद से मिलाती है!

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किसी मंज़िल का अजनबी रास्ता है ये

ज़िन्दगी में ज़िन्दगी का वास्ता है ये,

दूरियों में नज़दीकियाँ बनाती है

दोस्ती के किनारे कितनी कहानियाँ बन जाती है!

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मिलता नहीं वो एहसास किसी रिश्ते में

जो करिबियाँ दोस्ती ले आती है,

चाहे जैसे हो, जो हो, वक़्त और हालात

दोस्ती के किनारे ज़िन्दगी मिल जाती है!

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ये दिन दोस्ती का नहीं, दोस्ती से ये दिन है

हर पल, हर दम, यारियों का मौसम है,

ओढ़ कर चुनर खुशियों के फ़लक की

दोस्ती के किनारे हसरतें डूबकी लगाती है!

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शुक्रिया कहना लाज़िमी ना होगा

दोस्ती कहाँ किसी दायरे में सिमट पाती है,

ये समंदर है ज़िन्दगी के जहाँ कश्तियाँ अक्सर अंधेरों में

दोस्ती के किनारे सुकून से ठहर जाती है!

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#FriendshipDay2017

– साहिल

(5th August, 2017)