Baith Jaana Chahti Hoon!

बैठ जाना चाहती हूँ किनारों पर
लहरों का खेल अच्छा लगता है,
बहुत शोर है अपनों के शहर में
खामोशियाँ सुनना अच्छा लगता है!

अक्सर देखती हूँ कितने अन्जान चेहरें
खुद से मिलना अच्छा लगता है,
रिश्तों के धागे उतार कर कुछ पल
अपने लिये जीना अच्छा लगता है!

शाम के ढलते सूरज की छांव में
रात का साया घुलने लगता है,
मैं रेत की नमी में फिसलने लगती हूँ
मुझे अब अकेले चलना अच्छा लगता है!

माना कि हसरतें अक्सर पूरी नहीं होती
हसरतें फिर भी करने का दिल करता है,
साहिलों से लगकर लहरें हमेशा लौट जाती है
फिर भी साहिलों को इंतज़ार करना अच्छा लगता है!

बैठ जाना चाहती हूँ किनारों प
लहरों का खेल अच्छा लगता है,
बहुत शोर है अपनों के शहर में
खामोशियाँ सुनना अच्छा लगता है!

– साहिल

(अक्टूबर २०१७)

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Until We Meet Again!

All the moments, all the memories,
Every step of the beautiful journey,
That you’ve given me…
I’ll take them with me
As you take me with you,
To a place to find something new!

Turning the chapter of life
Staring at the page staring back at me
To write a new story where it’ll be either me or you,
But not us – the one we knew!

I know you’ll pray,
I know you’ll care,
In all those silences I know you’ll shed a smiling tear,
Life isn’t always about being in touch
I know you’ll tell this to you!

Crossing through thoughts
While unfolding a new phase in life,
Let’s bid a bye
Until we meet again!!!

* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *

There’s more to come
There’s more to live
There’s much more stories yet to be,
Our roads may or may not cross again
But all I wish – a better happy world for you!

Let the life take its plot
Let the time take you through what it has got
Sometimes it’s good not to expect the expected
Sometimes it’s good to let yourself liberated,
This life may plan to take you through odds,
All it tests is how long you can be you!

In this journey of life
Our paths crossed each other,
Like a poetry on rhyme
You made every moment a smiling whisper,
Now that it’s time to unfold different routes
I wish you find a better you in you!

Waving at you, I see you walk
I wish I could stop,
Maybe someday, sometime
On the crossroads
Let’s bid a bye
“Until we meet again”!!!

* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *

~~There is no end until the end!~~

– Sahil

(14th December, 2016)

Bas Ab Aur Nahi Hota, Mein Thak Chuki Hoon!

बस, अब और नहीं होता, मैं थक चुकी हूँ,
खुद से, अपनों से, लोगों से…

मैं थक चुकी हूँ!

दिल है कि धड़कता रहता है,
जाने किस धुन में टहलता रहता है,
ना कोई फिक्र इसे, ना परवाह दुनिया की
कुछ एहसासों की गलियों में घुमता रहता है।
थक चुकी हूँ दिल की बेफ़िक्री से, थक चुकी हूँ खुद से लड़ते-लड़ते,
बस, अब और नहीं होता खुद से लड़ना, मैं थक चुकी हूँ दिल की सुनते-सुनते!

शिकायतें लोगों की कम नहीं होती
वक़्त की ज़रूरतें यहाँ ख़त्म नहीं होती,
उलझी हुई हूँ सबको सुलझाने में
खुद की उलझनें है कि ख़त्म नहीं होती।
थक चुकी हूँ उलझनों में उलझ कर, थक चुकी हूँ खुद को मनाते-मनाते,
बस, अब और नहीं होता किसी को मनाना, थक चुकी हूँ रिश्ते निभाते-निभाते!

कोशिश करती हूँ कि सब कुछ संभाल लूँ
वक़्त और हालात में खुद को ढाल लूँ,
मगर कहीं ना कहीं कुछ कमी रह ही जाती है
समझकर, संभाल कर सब कुछ भी, सिर्फ अपनों की नाराज़गी हाथ आती है।
थक चुकी हूँ नाराज़गियों से, खुद को समझना भूल गई हूँ,
बस अब और नहीं होता किसी को समझना, थक चुकी हूँ सब कुछ संभालते-संभालते!

थम जाना चाहती हूँ खुद के साथ
कुछ देर खुद से मिलना चाहती हूँ,
जीना चाहती हूँ खुद के साथ
खुद पर कुछ खुशियाँ लुटाना चाहती हूँ।
थक चुकी हूँ खुद से भागते-भागते, थक चुकी हूँ खुशियाँ लुटाते-लुटाते,
बस अब और नहीं होता खुशियाँ लुटाना, थक चुकी हूँ खुद को छुपाते-छुपाते!

बस, अब और नहीं होता, मैं थक चुकी हूँ,
खुद से, अपनों से, लोगों से…

मैं थक चुकी हूँ!

– Sahil

(June’ 17)

Yun toh me Shayar Nahi!


यूँ तो मैं शायर नहीं
पर कभी-कभी एक चाहत ऐसी भी होती है,
कि शायरों की शायरी से कुछ लफ्ज़ चुरा कर
तुम्हारी पलकों की चिलमन में रख सकूँ!

कि गुज़रे वक़्त के एहसासों से भरे कुछ लफ्ज़
जिनके मानी अब खो गये है,
उन्हें तेरी बाहों की पनाह दे सकूँ!

कि उन गीतों के कुछ लफ्ज़
जिनके सुर तुम्हारे नूर में उलझे है,
उन्हें तुमसे मिला कर महफ़िल-ए-ग़ज़ल सजा सकूँ!

यूँ तो मैं शायर नहीं
पर कभी-कभी एक चाहत ऐसी भी होती है,
कि तेरे जिस्म से लेकर तेरे एहसासों की
हर वो छोटी से छोटी तफसील,
कुछ लफ्ज़ों की स्याही में रखकर
एक नज़्म में उतार सकूँ!

एक चाहत ऐसी भी होती है,
कुछ लफ्ज़ों की दुनिया में
तुझे हर रोज़ सिर्फ अपना बना सकूँ!

– Sahil

(April, 2017)

Shaayaron ki Duniya

शायरों की दुनिया में किसी बात का अन्त नहीं होता!

सालों पहले की ख्वाहिशें भी ज़िन्दा रहती है,
एहसास, ज़ख्म और मोहब्बत के किस्से
लफ्ज़ों के जरिये हमेशा कोई नयी नज़्म बुनती है।

वो एक नज़्म – – –

जो काफी होती है
सारे फ़ासले मिटाने को,
सारी दूरियों को नज़दीकियों के पूल पर मिलाने को,
सारे जज़्बातों को फिर से जी जाने को,
कि जैसे कल की ही बात हो!

शायद इसलिए शायरों की गलियों में खामोशियों की बहुत भीड़ रहती है

शायद इसलिए शायरों की दुनिया थोडी अलग, थोड़ी अजीब होती है

और शायद इसलिए शायरों की दुनिया में कोई रिश्ता ख़त्म नहीं होता,

क्योंकि लफ्ज़ों की सोहबत से मिली
शायरों की दुनिया में किसी बात का अन्त नहीं होता!

– Sahil

(May, 2017)

Ekaant

एकांत की एक बात समझ आई आज
ये एकांत, एकांत नहीं!

ये शोर है, जो सुनाई नहीं देता
ये सफ़र है, जो दिखाई नहीं देता,
सारी बेचैनियों को थाम कर अपने अन्दर
ये वो एहसास है, जो कभी आवाज़ नहीं देता!
ये कहानी का वो आधा पन्ना है
जो अधूरा रह जाता है,
ये स्याह लफ्ज़ों के बीच वो श्वेत हिस्सा है
जिसे पढ़ना कोई ज़रूरी नहीं समझता,
ये हवाओं के साथ जुड़ा हुआ वो बादल है
जो चुप-चाप उड़ता जाता है,
ये समन्दर की गहराइयों में डूबा हुआ एक साहिल है
जिसके सब्र की इन्तहा कोई नहीं समझता!

अक्सर देखता हूँ, ये तन्हा है मगर
ये एकांत, शांत नहीं!

एकांत की एक बात समझ आई आज
ये एकांत, एकांत नहीं!

– साहिल

(October 2017)

Khaamoshiyon ke Raaz!

खामोशियाँ कई राज़ लिये बैठी है
किनारों पर शामें इंतज़ार लिये बैठी है,
निगाहों में एक अश्क़ उतर आया है फ़लक से
कोई पढ़ ले इन्हें, ये ख़्वाब लिये बैठी है!

चेहरे ढूंढते है कोई अपने यहाँ
हर चेहरे पर कोई चेहरा डाले बैठी है,
सख़्त हो चले है इन लबों के लहजे
ये टूट जाने के ख़्याल से सहमी बैठी है!

काफ़िले चलने लगे है वक़्त के
सिलसिलों के कुछ सवाल लिये बैठी है,
ज़रूरतों के शहर में सुना है, कुछ आदतें
अब भी कुछ अधूरे से जवाब लिये बैठी है!

कहानी का कोई लम्हा है जैसे
ये सफहों पर एहसासों के अल्फाज़ लिये बैठी है,
लिखती जाती है कोरे कागज़ पर बेरंग सी स्याही
कोई समझ ना ले इन्हें, ये चुप-चाप बैठी है!

खामोशियाँ कई राज़ लिये बैठी है
किनारों पर शामें इंतज़ार लिये बैठी है,
निगाहों में एक अश्क़ उतर आया है फ़लक से
कोई पढ़ ले इन्हें, ये ख़्वाब लिये बैठी है!

खामोशियाँ कई राज़ लिये बैठी है. . .
खामोशियाँ कई राज़ लिये बैठी है!

– साहिल

(October 2017)

Ye Diwali :)

रोशनी के रंगों की सेज सजी है
दिल की चौखट पर खुशियाँ रखी है,
दूरियाँ मिटा कर रिश्तों में
ये दिवाली अपनों को जोड़ रही है!

हर घर आज उजियारा है
हँसी की फुलझड़ियाँ और उमंगों का फंवारा है,
आँखो की चमक में हर लम्हा कैद है
ये दिवाली नई यादें जोड़ रही है!

बचपन की गलियाँ आज फिर से भरी है
शहर से सुना है, कई पुरवाईयाँ लौटी है,
यारों की टोली आज मुद्दत के बाद मिली है
ये दिवाली बचपन से जोड़ रही है!

कुछ आँखो में फिर भी नमी सी है
अपनों के दरमियाँ किसी अपने की कमी सी है,
सारी खुशियाँ अपनी जगह पर लेकिन
ये दिवाली कुछ ग़म भी जोड़ रही है!

महक रही है घर की हवायें
दीवारें भी आज नई सी है,
जल रहे है अँधेरे, दीपक की लौ में
ये दिवाली रिश्तों को जोड़ रही है!

सारी हसरतें खेल रही है
पलकों के झूले पर झूल रही है,
लौट के आया सावन मिलन का
ये दिवाली एहसास जोड़ रही है!

रोशनी के रंगों की सेज सजी है
दिल की चौखट पर खुशियाँ रखी है,
दूरियाँ मिटा कर रिश्तों में
ये दिवाली अपनों को जोड़ रही है!

– साहिल
(१९ अक्टूबर, २०१७ – गुरुवार)

दीपावली के इस पर्व पर आपकी और आपके परिवार की असीम खुशियों की कामना करते हुए आप सभी को मेरी ओर से A very Happy Diwali 🙂

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Bachpan ki Galiyan!

छूट गयी वो गलियाँ बचपन की
अब शिक़वा क्या करना,
रह गयी कई कहानियाँ वहीं
अब गिला क्या करना!

वक़्त ने जैसे चेहरे पर कई चेहरे डाल दिये
कहीं रिश्तों के, कहीं ज़रूरतों के पहरे डाल दिये,
अब वो सुबह नहीं मिलती अंगड़ाई लेती हुई
और रातें अब सुकून में नहीं ढलती,
बहुत शोर है यहाँ रिश्तों के मकान में
इन रास्तों पर अब वो सहूलियत नहीं मिलती!

लबों पर बेफ़िक्री का भी एक ज़माना था
ना कोई परवाह ना कोई बहाना था,
बड़ी खुशहाल सी चल रही थी ज़िन्दगी
जाने क्यों ज़िन्दगी को शहर की ओर बढ़ जाना था!

खैर अब नज़रें चुरा कर जी रहा हूँ
चेहरे पर चेहरे छुपा कर मिल रहा हूँ,
खो गया वो आईना जो अपना सा लगता था
ज़िन्दगी बिखर गई इक सपने में जो कभी पलकों पर सजता था!

छूट गयी वो गलियाँ बचपन की, तो
अब शिक़वा क्या करना,
रह गयी कई कहानियाँ वहीं, तो
अब गिला क्या करना!

– साहिल

(Sep’ 17)

ऐ ज़िन्दगी, तू मुस्कुरा!

कोई वजह मिले ना मिले
ऐ ज़िन्दगी तू मुस्कुरा,
सफ़र में छाँव मिले ना मिले
ऐ ज़िन्दगी तू मुस्कुरा 🙂

दरिया है ये जीवन एक
बहता हुआ फिर भी ठहरा सा,
गहरी सी गहराइयों में डूबा
कुछ अफसानों से रीसा हुआ!
लहरों के उतार चढ़ाव में
कश्ती को किनारों से मिला,
लहरों की गूंज में खामोशियाँ छुपा कर
ऐ ज़िन्दगी तू बहती जा 🙂

ये जो ग़म के किस्से है
सभी के हिस्से है,
नज़रों में तन्हा पलकों पर उतरे
कुछ लम्हों के रिश्ते है!
हावी ना होने दे यादों की गिरहें
ग़म के साये में यूं ना सहम जा,
खुशियों को गले से लगा कर
ऐ ज़िन्दगी तू नये ख़्वाब सजा 🙂

सफ़र में तू अकेला नहीं
ये अकेला तेरा सफ़र है,
हर मोड़ पर मिलना बिछड़ना
जाने-पहचाने अजनबियों का सफ़र है!
जो छूट गया उस पर अफ़सोस नहीं
जो मिल गया उसका जश्न मना,
राहों में तू रुक नहीं
ऐ ज़िन्दगी हर हाल बस चलती जा 🙂

कीमत नहीं मुस्कराहट की कोई
अनमोल एहसास है लबों पर ठहरा,
इन एहसासों के दरमियाँ कहीं
एक खूबसूरत दुनिया बना!
आँखों में भर कर मुस्कुराहटों के नज़ारे
सभी के चेहरे पर ये तोहफ़ा सजा,
रोशन कर हर अंधियारे को
ऐ ज़िन्दगी तू मुस्कुराने की वजह बन जा 🙂

कोई वजह मिले ना मिले
ऐ ज़िन्दगी तू मुस्कुरा,
सफ़र में छाँव मिले ना मिले
ऐ ज़िन्दगी तू मुस्कुरा :))

~ साहिल
(२२ मार्च, २0१७)