Two silent moments!

एक बेपनाह खामोशी
एक गहरा सूनापन
एक लम्बी सी तन्हाई थी
दो लम्हों के दरमियाँ,
कहने को बहुत कुछ था
मगर लफ़्ज़ों में साँसें भर आई थी!

आहें निकलती रही
आंसू टपकते रहे
आवाज़ का अंदाज़ भी बदल चुका था,
दोनों को एहसास था 
फिर भी अजनबी सा हर एक अलफ़ाज़ था,
वाकिफ थे एक दूसरे की हर आहट से
फिर भी लबों पर झूठा इत्तेफ़ाक़ था!

कई बातें अब राज़ बन चुकी थी
सिलसिलों की रातें अब ख़्वाब बन चुकी थी,
गुज़रते वक़्त की दहलीज़ पर
जाने कितनी मरतबा ये धड़कन साथ छोड़ चुकी थी,
उस एक सन्नाटे में उम्र भर की हार मिली थी
लफ़्ज़ों की बंदिश में ज़िन्दगी बिछड़ रही थी,
बेबसी का आलम था दो लम्हों की जुस्तजू में
मीलों के फासलों में भी इनको कोई आह चुभी थी!

एक बेपनाह खामोशी
एक गहरा सूनापन
एक लम्बी सी तन्हाई थी
दो लम्हों के दरमियाँ,
एक दूसरे का आइना थे जो कभी
आज अजनबी सी लगती परछाई थी!


~ साहिल
(15th January, 2017)

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