बचपन के दिन

बीत गयी वो शामें,
छूट गए वो दिन,
जवानी के साँचे में ढलते-ढलते,
जाने कहाँ गुम हुए वो बचपन के दिन।
याद आता हैं वो मासूमियत का मौसम,
वो बचपन का सावन
काश कोइ लौटा दे,
वो खुशियों से भरे बेफिक्रे दिन।।।

वो कागज़ की कश्ती डूब गई,
वक़्त की लहरों में
वो रेशम की गुड़िया भी रूठ गई,
तन्हा फासलों के झूलों में
भीनी रेत की महक अब यादों में ही रहती हैं,
वो बारिश की हँसी रह गई बचपन की लकीरों में।
ना गुज़रते तो बेहतर होता,
ना बिछड़ते तो बेहतर होता,
सिलसिला बचपना का यूँही चलता रहता,
संग होते बचपन के दिन तो बेहतर होता।।।
जी रहे हैं, 
मगर ज़िन्दगी नहीं हैं
हँस रहे हैं,
मगर ख़ुशी नहीं हैं
दिन से रात हो जाती हैं,
शामें नहीं होती
बचपना अब एक आदत हैं,
फितूर नहीं हैं।
बसर रही हैं ज़िन्दगी,
वक़्त के टुकड़ों को गिन
काश कोई लौटा दे,
वो बचपन के सुनहरे दिन।।।

बीत गयी वो शामें,
छूट गए वो दिन,
जवानी के साँचे में ढलते-ढलते,
जाने कहाँ गुम हुए वो बचपन के दिन।
याद आता हैं वो मासूमियत का मौसम,
वो बचपन का सावन
काश कोइ लौटा दे,
वो खुशियों से भरे बेफिक्रे दिन।।।

-साहिल

Happy Children’s Day 🙂
#CelebrateTheBachpan

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