दिवाली बचपन वाली

खुशियों की झोली लिए घर आँगन में रहती
आँखों में उम्मीदों के नए दीपक जलाती,
वो मेहमान नहीं, वो हिस्सा थी हमारी
बडी प्यारी थी, वो दिवाली बचपन वाली!

दीये से चौखट उज्वलित होती दस दिन पहले से
पटाखों की गूँज से आगाज़ होता एक महीने पहले से,
बड़ा अच्छा लगता था मम्मी-दादी के साथ दीये भरना
वो अनेक जलती लौ के घेराव से आँगन में छवि बनना!
शायद उम्र छोटी थी उसकी भी…जैसे हमारी
वो मेहमान नहीं, वो हिस्सा थी हमारी
बडी नटखट थी, वो दिवाली बचपन वाली!

यादों के डिब्बे मिलते थे घर की सफाई में
दीवारों पर गुज़रे वक़्त के लम्हे मुस्कुराते थे,
लॉन में लगे झूले पर बीती होली का रंग खिलता था
और ख़्वाबों में गुज़रे साल का पन्ना पलटता था!
कुछ अच्छी यादें सहेज कर, बुरी यादें बाहर हो जाती
वो मेहमान नहीं, वो हिस्सा थी हमारी
यादों का सार थी, वो दिवाली बचपन वाली!

हर चेहरा जगमग हो उठता हर्षोल्लास से
कोई पराया ना होता अपनों के साथ में
सारे ग़म और शिकवे भी भुला कर एक नए सफर का आगाज़ होता
रिश्तों की डोर में पड़ी गिरहें खोल देता!
नयी रोशनी, नयी खुशियां, नये सपने ले आती
वो मेहमान नहीं, वो हिस्सा थी हमारी
हँसी का उपहार थी, वो दिवाली बचपन वाली!

नये-नये कपडे पहनने का अलग एहसास होता
लजीज़ पकवान का ज़ुबान पर और घर में हमेशा स्वाद रहता
डरना पटाखों से पर पटाखों की ज़िद करना
और दिवाली के अगले दिन जेब खर्ची के लिए निकल पड़ना!
वो सिर्फ एक त्यौहार नहीं, एक जज़्बात थी हमारी
वो मेहमान नहीं, वो हिस्सा थी हमारी
एक बचपन की दोस्त, वो दिवाली बचपन वाली!

छुटियों का इंतज़ार थी,
खुशियों का दीदार थी,
वो मेहमान नहीं, वो हिस्सा थी हमारी
बहुत याद आती है,
वो दिवाली बचपन वाली
वो दिवाली बचपन वाली!

~~साहिल

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